स्वतंत्र भारत में अंतिम सांस लिए थे बाबू कुंवर सिंह:प्राचार्य प्रो ओम प्रकाश राय
आरा/भोजपुर(डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)24 अप्रैल।महाराजा कॉलेज आरा के प्रांगण में अवस्थित वीर बांकुरा बाबू कुंवर सिंह की प्रतिमा पर विजय दिवस के पावन अवसर पर कार्यक्रम प्राचार्य प्रो ओम प्रकाश राय के नेतृत्व में संपन्न हुआ। चुनाव आचार संहिता एवं पूरा कॉलेज चुनाव का केंद्र होने के कारण कार्यक्रम धूमधाम से नहीं मनाया जा सका। फिर भी कॉलेज ने महान स्वतंत्रता सेनानी, स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम महानायक बाबू कुंवर सिंह की के विजय दिवस पर माल्यार्पण का कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसके बाद प्राचार्य प्रो ओम प्रकाश राय ने इस विजय दिवस के अवसर पर तमाम कॉलेज के शिक्षक कर्मियों छात्र-छात्राओं को विजय दिवस की शुभकामनाएं और बधाई दी। इस कॉलेज में प्रधानाचार्य कार्यालय के ठीक सामने बाबू कुंवर सिंह की प्रतिमा लगी हुई है। इनके पीछे आरा हाउस जो राष्ट्रीय संग्रहालय बना हुआ है।प्रो सिंह ने विजय दिवस मनाते के तथ्यों को रखते हुए बताया कि कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को किस तरह से 80 वर्ष की आयु में घुड़सवारी और तलवारबाजी के बल पर अंग्रेजों के विशाल फौज और अस्त्र शास्त्र को नेस्तनाबूत कर उन्हें अपना बंधक बनाया और सबसे पहले इसी आरा हाउस को स्वतंत्र बनाया।
आरा हाउस अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा और सुरक्षित किला माना जाता है जहां अंग्रेजों के बड़े पदाधिकारी और परिवार रहते थे। इसके पूर्व मंगल पांडे जी द्वारा दानापुर छावनी में विद्रोह हुआ। उसे विद्रोह के फलस्वर बहुत से सैनिकों ने वहां से बैरक छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन के लिए बगावत करते हुए छावनी से निकल पड़े और अंग्रेजों को मारते काटते आरा पहुंचे। अंग्रेजों की जबरदस्ती राक्षसी प्रवृत्ति और भारतीयों को पूरी तरह से परेशान करना इनकी नियति हो गई थी ।जिसके चलते हर जगह विद्रोह था। इन सैनिकों के मिलने से कुंवर सिंह का और हौसला बुलंद हो गया और इन्होंने अंग्रेजों को समूल नाश करने का संकल्प लिया। सबसे पहले इसी आरा हाउस की घेराबंदी कर दी और 7 दिनों तक इसी किले में सभी अंग्रेजों को बंद रखा। इनको राशन और पानी सबको बंद कर दिया।अंततः सबको बंदी बनाकर अपना झंडा लहरा दिया। इसकी खबर मिलते ही अंग्रेजों के की बहुत बड़ी फौज आरा के लिए कूच की। इसी क्रम में बाबू कुंवर सिंह का जगदीशपुर का किला को तोप लगाकर अंग्रेजों ने उड़ा दिया।दहशत फैलाने के लिए जो मिलता था उसे मार कर पेड़ पर लटकाया जाता था ताकि कोई आंदोलन की तरफ दोबारा नजर नहीं उठा सके। आरा फतह के बाद कुंवर सिंह बलिया की तरफ बड़े लेकिन शिवपुर घाट पर किसी ने सूचित कर दिया कि कुंवर सिंह यहां से गंगा पार करने वाले हैं और अंग्रेजों ने इन्हें गोली चलाई जो हाथ में लगी और उसे हाथ को पुनः काटकर मां गंदे को समर्पित किया और फिर अपने पूरे सैनिकों के साथ जगदीशपुर लौटे और यहां भी सबको मार काट कर भगा दिया और जगदीशपुर में पुनः इनका झंडा लहरा और अंतिम सांस भी स्वतंत्र भारत में लिए। ऐसे थे हमारे वीर बहादुर अपराजेय योद्धा बाबू कुंवर सिंह। जिन्हें कभी अंग्रेज इन्हें पकड़ नहीं पाए। इनका रियासत जगदीशपुर और आरा इनके शौर्य और पराक्रम का गीत आज भी गाता है और सदियों सदियों तक गाता रहेगा।

