पटना/बिहार (राकेश मंगल सिन्हा) 17 अप्रैल। राजद के वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी का कहना है कि 400 कौन कहे, मोदी जी के लिए 200 पार करना कठिन होगा। उन्होंने कहा कि मोदी जी का यह कैसा संकल्प है ! अगले 5 वर्षों तक 80 करोङ लोगों को मुफ्त राशन मिलता रहेगा। संकल्प तो यह होता कि हमारी सरकार अगले 5 वर्षों में 10 करोड़ या 20 करोङ लोगों को इस लायक बना देगी कि वे मुफ्त राशन पर निर्भर नहीं रहेंगे।
उन्होंने कहा कि मोदी जी के पिछले 10 साल के शासनकाल में देश की क्या स्थिति है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में हालत खराब है। पिछले 5 वर्षों में अस्पताल में भर्ती होने के बाद खर्च में दोगुना वृद्धि हुई है। दवाइयों की कीमतों में हर वर्ष वृद्धि हो रही है। इलाज गरीब आदमी की पहुँच से बाहर होता जा रहा है। संकल्प तो यह कहा जायेगा कि अगले एक या दो साल में दवाइयों की कीमत आधी या चौथाई कम कर देंगे।
शिक्षा के क्षेत्र में भी यही हाल है। 2019 के अपने चुनाव घोषणा पत्र में मोदी जी ने वादा किया था कि उनकी सरकार शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करेगी। लेकिन खर्च हुआ मात्र 2.7 प्रतिशत। शिक्षा पर खर्च के मामले में दुनिया के देशों में हमारा देश 136वें स्थान पर है। देश में महंगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है। 2014 में युवाओं को मोदी जी ने सपना दिखाया था कि हमारी सरकार बनेगी तो हम प्रति वर्ष 2 करोड़ नौकरी देंगे। आज बेरोजगारी का प्रतिशत चिंताजनक है। देश की अंदरूनी हालत भी आश्वस्त करने वाली नहीं है। मोदी जी मणिपुर को संभाल नहीं पा रहे हैं। उधर लेह, लद्दाख और कारगिल का इलाका उबल रहा है। इसी इलाके में चीन हमारे हजारों वर्ग मील जमीन पर कब्जा जमाये बैठा है।
राजनाथ जी का दावा है कि भारत जब विश्व के मंच पर बोलता है तो दुनिया सुनती है। लेकिन हकीकत क्या है ? बगल में 5 लाख की आबादी वाला देश मालदीव हमारा घोर विरोधी हो चुका है। वहाॅ की अब तक की परंपरा रही है कि चुनाव जीतने वाला राष्ट्रपति अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत भारत से करता है। अबकी बार यह परंपरा टूट गई। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ने अपनी विदेश यात्रा की शुरुआत चीन से की है। भूटान भी बेचैन है। हालांकि अभी प्रधानमंत्री जी वहाँ गए थे। पूर्व में भारत भूटान को प्रति वर्ष 5 हजार करोङ रुपये की सहायता देता था। अपनी ताजा यात्रा में प्रधानमंत्री जी ने सहायता राशि दोगुनी यानी 10 हजार करोङ रूपया कर हालात को सुधारने का प्रयास किया है।
पिछले 10 वर्षों के मोदी शासन काल में देश में लोकतंत्र की क्या हालत है ? वैसे तो हमारे देश की शासन व्यवस्था के तीन खम्भे हैं। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। तीन खम्भों में न्यायपालिका पर सरकार का गंभीर दबाव है। जबकि न्यायपालिका को हमारे संविधान का गार्जियन माना जाता है। हमारे संवैधानिक अधिकारों की रक्षक न्यायपालिका ही है। अभी उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के भूतपूर्व न्यायाधीशों का सार्वजनिक बयान आया है। उन्होंने न्यायपालिका पर सरकार के बढ़ते दबाव और दबाव के चलते प्रभावित होते निर्णयों को लेकर सार्वजनिक रूप से चिंता प्रकट की है।
मोदी जी ने लोकतंत्र को ही लंगड़ा बना दिया है।
लोकतंत्र के चौथे खम्भे को इन्होंने लगभग अपने कब्जे में कर लिया है। वह चौथा खम्भा है मीडिया। अखबार और टेलिविजनों के समाचार चैनल। जहाँ मीडिया स्वतंत्र नहीं है वहाँ लोकतंत्र को स्वस्थ और चैतन्य नहीं माना जाता है। यही वह माध्यम है जिसके जरिए जनता का सुख-दुख सरकार तक पहुँचता है या सरकार की बात जनता तक पहुँचती है। इधर टेलीविजन एक मजबूत माध्यम बन गया है। अखबार तो हर जगह नहीं पहुँचता है। लेकिन टेलीविजन की पहुँच तो प्राय: झोपड़ियों तक हो चुकी है। टेलीविजन पर दिन रात मोदी जी दिखाई और सुनाई देते हैं। एक से एक पोशाक और तरह-तरह की रंगीन पगड़ी में। मोदी जी आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं। लंबा-लंबा प्रवचनी अंदाज में भाषण करते हैं। यह एक प्रकार का रोग है। इसके शिकार व्यक्ति को अपना ही चेहरा, अपनी ही बोली अच्छी लगती है। बीच में अगर कोई टोक दे या सवाल पूछ दे तो वह लड़खड़ाने लगता है। अपनी इसी कमजोरी की वजह से पिछले 10 वर्षों में मोदी जी ने प्रेस वालों से एक मर्तबा भी बात नहीं की है। क्योंकि महंगाई, बेरोजगारी या गरीबी के सवालों का उनके पास जवाब नहीं है। लेकिन इन समस्याओं से आम आदमी परेशान है। मोदी जी की पगड़ी से या उनके भाषणों से न महंगाई दूर हो रही है और न बेरोजगारी। इसलिए इस चुनाव में 400 नहीं, मोदी जी के लिए 200 पार करना भी मुश्किल होगा।


