
बसंत अबके बरस..!
आना था उसे जिस रस्ते से
और लौटेगा जिधर से
खड़ा रहा इसबार भी मैं
ठीक-ठीक वहीं
वहीं बाजू में खड़े गदराए सहिजन पर
मगन मन झूलती गिलहरियाँ
उसकी आहट से अनभिज्ञ
कुतरे जा रहीं सफेद फूलों को
आम व जामुन के पत्तों में
मची रही होड़ कि
कौन कितना तेज़ी से
उतर सकता है जमीं पर
सनसनाती हवा रह-रह के झकोरती
जैसे कोई आ रहा हो
वायु-वेग संग
रोज की तरह हँसी-ठट्ठा करते
कोचिंग क्लासेज वाले लड़कों से
होड़ लेने में असमर्थ
अब भी सकुचाई भागी जा रही
लड़कियाँ सधे पाँव
अभी कुछ हीं दिनो पहले
गमले में उगे गुलाब से
कैसे कह दूँ सबकुछ
उसके बारे में
और हैरान-परेशान
मैं निहारते रहा तब से अब तक
उसकी राह ।
