
हवा..!
हवा ही दुनिया हवा ही जीवन।
विमुख हवा से हुआ सब निर्जन।
बदलती हवा है खूब चलती हवा।
हवा हवा में इधर-उधर बहती हवा।
रुकी-रुकी हवा ठहरता धड़कन।
बहते रुधीर की है मदमस्ती हवा।
बदलते हवा है बदलते है जीवन।
शिखर को चूमा धारा पर पड़ा।
बन उठा बवंडर इधर-उधर घूमा।
कोई मुंदे आँखे कोई छुपे जा के।
बावली सा जब यूँ अंगड़ाती हवा।
कभी बनती बसंती कभी जलाती हवा।
कभी फुहारों संग ईठलाती हवा।
कभी कपाती कभी ठहरता जीवन।
कभी घूल फूलो संग झूमाती हवा।
कभी पत्तियों संग मचलती हवा।
कभी फलो में रस भर जाती हवा।
कभी बन मधुकर सी गुनगुनाती हवा।
हवा ही दुनिया हवा ही जीवन।
विमुख हवा से हुआ सब निर्जन।
हुआ सब———–।

