
जीवन की अंतिम यात्रा !
जीवन की अंतिम यात्रा पर
हम निकल पड़े थे सज धज कर
चार कहार बने मित्र गण उठा लिया मेरी डोली को
चला घर से मै ऐसे जैसे चला प्रिया मिलन को
मेरा दम्भ द्वैष पाखंड ज्ञान और अज्ञान
मेरा सब अभिमान मान और सम्मान
छूट गये थे ऐसे मुझसे जैसे हो पतझड
मै चला अपने पथ पर लेकर केवल तन
कुछ राम नाम को गाते थे
कुछ आपस मे बतलाते थे
कुछ लिए वेदना थे मन मे
कुछ मेरी बात बताते थे ।
कुछ के आँखों मे नीर भरे थे
कुछ चुप चाप मौन खड़े थे
कुछ सोच रहे थे खड़े खड़े
मै सबको देख रहा था पड़े पड़े ।।
जीवन की सारी कमाई छोड़ कर
चल पड़ा था खाली हाथ को कर
सब छोड़ दिया था ये कह कर
अब पहुँच गया हूँ अपने निज घर ।।
जीवन की अंतिम यात्रा पर
हम निकल पड़े थे सज धज कर ।।
साभार “शब्दों की सरिता”मंच
