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अधिवक्ता दिवस के रूप में आखिर क्यों मनाई जाती है भारत रत्न डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की जयंती?

अतुल प्रकाश (एडिशनल गवर्नमेंट काउंसेल भारत सरकार)

अतुल प्रकाश(एडिशनल गवर्नमेंट काउंसेल भारत सरकार) 03 दिसंबर।वैसे तो आधिकारिक तौर पर डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती अधिवक्ता दिवस के रूप में नहीं मनाई जाती है। मैंने जनहित परिवार से जुड़े सीनियर अधिवक्ता दिवंगत पं० नरदेश्वर ओझा जी से इस संबंध में प्रश्न किया था। उन्होंने बताया था कि सबसे पहले भोजपुर अधिवक्ता संघ के द्वारा में डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाई गईं थी और धीरे-धीरे अन्य विधि मंडलों में इसका प्रचलन बढ़ा। मेरी जहां तक समझ है विशेष रूप से वकील, मुख्तार एवं बैरिस्टर आदि प्रचलित नामों को समाप्त कर सभी को एक नाम अधिवक्ता देने का श्रेय डॉ राजेंद्र प्रसाद की देन है शायद इसीलिए इसको- अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाना सर्वाधिक उपयुक्त होगा। विविध प्रकार के आलेखों को सर्च करने के बाद कुछ एक सूचना से आपको अवगत करा रहा हूं ताकि आप समझ सकें की आखिर क्यों अधिवक्ता दिवस का प्रचलन हुआ होगा। ऐसे मेरे पास कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं है कि आखिर क्यों डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की जयंती अधिवक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है।
भारत के संविधान निर्माण में राजेंद्र प्रसाद की महती भूमिका थी। वे संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष थे। भारतीय संविधान के हिंदी अनुवाद में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का योगदान भूलाया नहीं जा सकता। विधि हिंदी शब्दावली के निर्माण में भी डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के योगदान को स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। यद्यपि राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू से शुरू हुई थी तथापि बी० ए० में उन्होंने हिंदी ही ली। वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी व बंगाली भाषा और साहित्य से पूरी तरह परिचित थे तथा इन भाषाओं में सरलता से प्रभावकारी व्याख्यान भी दे सकते थे। गुजराती का व्यावहारिक ज्ञान भी उन्हें था। *एम० एल० परीक्षा के लिए हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रंथों से ही अध्ययन किया था।* हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं जैसे भारत मित्र, भारतोदय, कमला आदि में उनकेज लेख छपते थे। उनके निबन्ध सुरुचिपूर्ण तथा प्रभावकारी होते थे। 1912 ई. में जब अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन कलकत्ते में हुआ तब स्वागतकारिणी समिति के वे प्रधान मन्त्री थे। 1920 ई. में जब अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन का 10वाँ अधिवेशन पटना में हुआ तब भी वे प्रधान मन्त्री थे। 1923 ई. में जब सम्मेलन का अधिवेशन काकीनाडा में होने वाला था तब वे उसके अध्यक्ष मनोनीत हुए थे परन्तु रुग्णता (illness) के कारण वे उसमें उपस्थित न हो सके अतः उनका भाषण जमनालाल बजाज ने पढ़ा था। 1926 ई० में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के और 1927 ई० में उत्तर प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे। हिन्दी में उनकी आत्मकथा बड़ी प्रसिद्ध पुस्तक है। अंग्रेजी में भी उन्होंने कुछ पुस्तकें लिखीं। उन्होंने हिन्दी के ‘देश’ और अंग्रेजी के *’पटना लॉ वीकली’* समाचार पत्र का सम्पादन भी किया था।
डॉ राजेंद्र प्रसाद के सच्ची श्रद्धांजलि तब हो गई जब सभी अधिवक्ता हिंदी में अपना काम कार्य करेंगे और सभी न्यायालय हिंदी में कामकाज को बढ़ावा देंगे।

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