बलिया/उत्तर प्रदेश (प्रियंका कुमारी)26 नवंबर। “ग्रामीण इतिहास मूलतः ज्ञान और लोक समाज के संघर्ष का इतिहास है। भारत के गांवों में बिखरे भारतीय इतिहास के स्रोत ये बतलाते हैं कि बिना ग्रामीण समाज की स्मृतियों में मौजूद स्रोतों के उपयोग के इतिहास लेखन हमेशा अधूरा रहेगा। ये स्रोत बतलाते है कि मानव समाज के संघर्ष के इतिहास में कृषि संस्कृति की एक बड़ी भूमिका रही है जिसे इतिहास लेखन की प्रक्रिया में विस्मृत कर दिया गया।” 1857 के सेनानी मंगल पांडेय के गांव नगवा में क्रिएटिव हिस्ट्री, रंगश्री, परम्परा/जेएनयू स्कॉलर्स समूह और बक्सर इतिहास संस्थान द्वारा आयोजित *11वें क्रिएटिव हिस्ट्री वार्षिक सम्मेलन 2023* के _मेरा गांव, मेरा इतिहास_ विषयक परिसंवाद में उभरकर ये बातें सामने आई।
कार्यक्रम में 16वां कुंवर सिंह स्मृति व्याख्यान देते हुए प्रसिद्ध लेखक जनार्दन राय ने जहां इतिहास लेखन में गांव के समाज को ज्ञान की परंपरा का केंद्र बताया वहीं, 11वां रामायण चौबे स्मृति व्याख्यान देते हुए आलोचक श्रीपत यादव ने बलिया क्षेत्र में मौजूद भारतीय ज्ञान की परंपरा और लोक समाज के साथ उसके जीवन संबंध को महत्वपूर्ण बताया। व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक चिंतक बी एन पांडेय ने कहा कि लोकगीतों और संस्कारों में गांव का इतिहास छुपा हुआ है। यह एक विज्ञान है। उन्होंने भ्रांतियों को दरकिनार कर वास्तविक इतिहास को सामने लाने का आग्रह सर्जनात्मक इतिहास समूह के इतिहासकारों से की। ग्रामीण चिंतक कंवलजीत सिंह ने भाषा, वेशभूषा और अन्नोतपादन की परंपरा को इतिहास लेखन के केंद्र में रखने की बात की।
कार्यक्रम के प्रारंभ में नगवा में जन्में 1857 के शहीद मंगल पांडेय के दुर्लभ वास्तविक चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित करके हुआ। स्वागत युवा चिंतक और क्रिएटिव हिस्ट्री के सचिव आशीष पांडेय ने किया। इतिहासकार एवं सर्जनात्मक इतिहास की संस्थापक रश्मि चौधरी ने देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के नायक मंगल पांडेय के योगदान को याद किया।
उन्होंने सर्जनात्मक इतिहास की रूपरेखा पर बात करते हुए वर्तमान समय में स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में ग्रामीण समाज के प्रतिरोध एवं संघर्ष को एक प्राथमिक स्रोत बताया। बातचीत की प्रक्रिया में यह बात भी उभरकर आई कि लोगों का इतिहास आज भी बताता है कि वास्तव में ऐसा था। लेकिन बहुत सी चीजें ऐसी हैं जो इतिहास में लिपिबद्ध नहीं है। इसलिए गांव के इतिहास को जाने बगैर भारत का इतिहास अपूर्ण है, जो वास्तव में इतिहास ऐसा था पर प्रश्नचिह्न लगाता रहेगा।
परिसंवाद सत्र में ग्रामीण इतिहास पर बोलते हुए साहित्यकार और ग्रामीण इतिहास में दिलचस्पी रखनेवाले देवेन्द्र चौबे ने कहा कि “बलिया, बक्सर और बनारस का क्षेत्र मूलतः प्राचीन ज्ञान और दर्शन, कृषि कार्य एवं ब्रिटिश उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद के खिलाफ प्रतिरोध की चेतना के निर्माण का था जिसके कारण भारतीय इतिहास में मंगल पांडेय, कुंवर सिंह, अमर सिंह, चित्तू पांडेय , दिलावर खान, इब्राहिम खान आदि जैसे अनेक स्वतन्त्रता सेनानी आते हैं। ग्रामीण इतिहास लेखन की प्रक्रिया में इन संदर्भों को सामने लाना जरूरी है। ”
कार्यक्रम का संचालन आर्यन पांडेय ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ अंजनी कुमार पांडेय ने किया। कार्यक्रम में बलिया क्षेत्र के लोगों की बड़ी संख्या में उपस्थिति ने बताया कि इतिहास हमेशा मानव समाज के आकर्षण के केंद्र में रहा है।

