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दीये के साथ जल रहे हैं कुम्हारों के दिल।

पटना/बिहार (राकेश मंगल सिन्हा) 10 नवम्बर। दीपोत्सव या दीपावली दीपों का त्योहार है। कार्तिक महीने की अमावस्या को दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है। दीपों का त्यौहार होने के कारण इसे दीपोत्सव भी कहा जाता है। दीपावली के दिन लोग रात में अपने पूजा स्थलों तथा अपने घरों में दीप जलाते हैं। इसके पहले लोग अपने घरों की साफ सफाई करते हैं। दीपावली के दिन लोग माॅ लक्ष्मी की पूजा करते हैं और घरों में दीया जलाते हैं। लोगों की ऐसी मान्यता है कि दीपों से जगमग साफ-सुन्दर घरों में माॅ लक्ष्मी ज्यादा खुश होकर आती हैं। परम्परा के अनुसार मिट्टी के दीये में तेल डालकर और बत्ती लगाकर दीये जलाये जाते हैं। दीपावली के लिए कुम्हार मिट्टी के दीये और तरह-तरह के पारंपरिक खिलौने बनाते हैं। दीवाली के अवसर पर उनकी बिक्री होती है। जिससे कुम्हारों की आय बढती है। परंतु आज के फैशन के युग में लोग मिट्टी के दीयों के बदले डिजाइनर मोमबत्ती और तरह-तरह के बिजली के आकर्षण लाइट लगाकर अपने घरों को जगमग कर रहे हैं। आजकल बाजार में चाइनीज दीयों की भरमार हो गई है। अलग-अलग तरह के आकर्षक डिजाइन के चाइनीज दीये बाजार में बिक रहे हैं। इससे पारंपरिक दीयों की बिक्री कम हो गई है। पहले मिट्टी के दीयों और खिलौनों को बेचकर कुम्हार अच्छी खासी आमदनी कर लिया करते थे। अब तो तरह-तरह के आकर्षक चाइनीज दीयों और खिलौनों से बाजार पटे हुए हैं। लोग भी मनभावन डिजाइन के चाइनीस दीयों और खिलौनों की तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं और उन्हें खरीद रहे हैं। इससे पारंपरिक दीयों और खिलौने की बिक्री काफी घट गई है। जिसका असर कुम्हारों की अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहा है। उनका मेहनत बेकार हो रहा है। साथ-साथ उनकी आमदनी भी काम हो गई है। इससे कुम्हारों की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। कुम्हारों का कलेजा कचोटने लगा है। दीयों के जलने के साथ ही कुम्हारों का दिल भी जलने लगा है। गाॅव से लेकर शहरों तक कुम्हारों की यही स्थिति है। इससे कुम्हार अपने पारंपरिक धंधे को छोड़कर अन्य कामों या नौकरी में जाने लगे हैं। उनका अपने पारंपरिक धंधों के प्रति रुझान कम होते जा रहा है। यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यदि सरकार ने चाइनीज दीयों और खिलौनों के आयात पर रोक नहीं लगाई तो देश के कुम्हार अपने पारंपरिक धंधों को बंद कर देने पर मजबूर हो जायेंगे। किसानों की तरह कुम्हार भी आत्महत्या करने पर मजबूर हो जायॅ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

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