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हम कहाँ से कहाँ आ गए??

अजयगुप्ता अज्ञानी

RKTV NEWS/अजय गुप्ता अज्ञानी,30 अक्टूबर।सूरज अगर अपनी रौशनी ना बिखेरे तो क्या होगा??पेड़ अगर ऑक्सीजन ना दें तो फिर क्या होगा??किसान अगर अपना सारा अनाज खा जाए तो फिर क्या होगा??
कम्पनिया ही अगर रिटेलर काउन्टर खोल खुदरा दुकानदारी करने लगे तो फिर क्या होगा??
जी हाँ आज की दौर के कुछ ज्वलन्त प्रश्न है मगर इसका उत्तर क्या है??
समझ नहीं आता!!! किसान तो खैर अपना सारा उत्पाद नहीं खाता है इसलिए एक बड़ी जनसँख्या उनके उत्पाद पर पल रही है।
बाजार व कमाई के मायने तो जरुर बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने बदल कर रख दी है। एक समय था जब बाजारें थीं छोटी-बड़ी आबाद दुकाने थीं बाजारों में रौनक थी चहलकदमी अच्छी होती थीं, खुशहाली थीं। बच्चो में उमंग था चारो तरफ चेहरे खिले नजर आते थे। कोई चीज खरीदने व गिफ्ट देने का ज़ज्बा था लोगो में, काफी उत्साह का माहौल बाजारों में हुआ करता था। आज तो कोई लुटी हुई विधवा सी बेजार बेजान बाजारें प्रतीत होती है। बेजार सून रुआँसी कोई तस्वीरो सी। चारो तरफ बेजान बेचैन आँखे चेहरो पर चिन्ता की तैरती लकीरें गिरते उठते दुकानो के सटर अब कर्कश लगने लगा है। पता नहीं वो जगह सालो से जो जीविका का साधन था अब उबाऊँ क्यों लगने लगा है?
क्या कारण है? वहाँ कोई अब माता लक्ष्मी की कृपा नहीं रही। शायद माता लक्ष्मी को तो अब कम्पनियो ने कैद कर रखी है। तो बाजार तो बंजर हो ही जायेगा न।
आज भीड़-भाड़ सड़को पर जरुर दिख रही है। त्योहारी सिजन का मौसम चल रहा है लग्न की भी आहट आने लगी है। परन्तु दूकानो पर सन्नाटा है ऐसा क्यों हो रहा है?सन्नाटो की मौन आवाजें क्या कह रही है?इन आवाजों को कौन पहचानता है, हैं कोई?
जब बाजारो में सैकड़ो दूकानें हुआ करती थीं व हजारो परिवार पलते थे उनके सपने कुलांचे भरते थे अब उन सपनो को कम्पनियां निगल गई। अब कम्पनियों की छोटी-छोटी खुदरा दुकाने छोटे शहरो गलियो मुहल्लों में खुलने लगी हैं। अब गली मुहल्लो के पहले से बेरोजगार बैठे युवक कुछ छोटे पूँजी से गली मुहल्लो छोटे शहरो गांव में कुछ रोजगार कर के जी लेते थे। अब उन व्यवसायो पर कम्पनियो की बुरी नजर लग गई हैं और यें कम्पनियां खुदरा पर एकाअधिकार कर ली है और छोटे पूँजी वाले बेरोजगार हो गए हैं क्योंकि बड़े-बड़े कम्पनियो के लोक लुभावन माया जाल में आम ग्राहक खिचते चले जाते हैं और कम्पनियों के सस्ते लगने वाले समान को मँहगे में छूटें व किस्तो के मृगमरीचिका में पर कर बडे कम्पनियो के माल ब्राण्ड के नाम पर खरीद लाते है व खरीदने के शौक रखते हैं नयी जनरेशन को तो छोटी दूकानें तुच्छ लगने लगी है। क्योंकि आम जन कुछ ज्यदा दिखावटी और भटकावटी पर यक़ीनन करने लगा है। समाज में कुछ सोचने समझने की क्षमता दिखावटी व भटकावटी बाजारों ने छिन रखी है। खैर जो भी हो बड़ी कम्पनियां गांव घर के छोटे दुकानदारो को खा गई। वो कहा गया है न बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है वो अब चरितार्थ होता दिख रहा है। “पहले कहावत थी उँची दूकान फीकी पकवान आज लोग कहते है उँची दूकान मीठी पकवान।” सोच में परिवर्तन गहरा आया है तो फिर बात है कि छोटा दूकान वाले करे क्या???
एक तरफ बेरोजगारी मार रही दूसरी तरफ दूकानदारी मार रही। और बड़े कम्पनियों की पूंजीगत सुनामी के सामने छोटे बाजार और दूकानदार खर तिनको के तरह उड़ गए। अब सरकारो को छोटे दूकानदारो व बाजारो पर ध्यान देना चाहिए नहीं तो बहुत देर हो जायेगी। और धरा पर आबाद रहेंगी माॅल, कम्पनियो का रिटेल काउन्टर व ऑनलाइन बाजारें। और पुराने परम्परागत बाजारे, दुकाने म्यूज़ियम व किस्से कहानियो में सिमट जायेंगी।

बाजार में पैसा कहाँ से आता है???

जी हाँ बाजार में पैसा वेतन भोगियो के वेतन से ही आता है। और व अपना जरुरत का समान बाजारो से खरीदते है तो पैसा बाजारों में आता है। मगर साल दर साल नौकरियाँ कम हुई है बेरोजगारी बढ़ी है। कुछ प्राइवेट सेक्टर में काम करते है जिनकी वेतन बहुत कम होती है जो पेट से उपर की खरीदारी नहीं कर पाते कमाई के अपेक्षा मँहगाई बिकराल हुई है। इससे लोगो की खरीदारी क्षमता घटी है। और प्राप्त वेतन का एक बड़ा हिस्सा माॅल, रिटेल कम्पनियाँ ऑनलाइन बाजारें शिक्षा व दवाई में चली जा रही है। इसलिए छोटे दूकानो व बाजारो तक ग्राहक नहीं पहुंच पाते हैं और छोटे दूकान व बाजारें दम तोड़ रही हैं।
मगर कुछ लोगो का यह तर्क है कि कम्पनियां,माॅल ऑनलाइन बाजारें लोगो को रोजगार दें रही है तो लाखो को बेरोजगार कर एक आधगो नौकरी देते है कम सैलरी पर तो यह बात न्यायसंगत नहीं है। यह देखा जाना चाहिए कि जो हम काम कर रहे है उससे फायदे कितने है घाटे कितने है। लाखो को बेरोजगार कर हजारो को कम सैलरी पर नौकरी भी देना न्यायसंगत तो कतई नहीं हैं। जो लोग माॅलो में ऑनलाइन बाजारो में सेलस मैन का कार्य करते है कम वेतन पर हाड़तोड़ मेहनत करते और जो वेतन पाते है बामुश्किल से परिवार चला पाते है गुर्बत के साय में रहते है ऐसे काम को कुछ लोग नौकरी की संज्ञा दे देते है जबकी यह मजबुरी का द्योतक है या हाल कुछ “मनरेगा” के मजदुरो जैसी। ऐसी व्यवस्था से क्या स्वास्थ्य व मजबूत समाज व राष्ट्र का निर्माण हो सकता ? माॅलो ऑनलाइन बाजारो और कम्पनियो की दुखदरा कारोबार का वकालत करने वाले व मिटते छोटे व्यवसाय व बाजारो व इसके मजबूत बिरास्त को जृणसृण होते हलातो पर एक बार फाज़िल महानुभावो को एक बार फिर से विचार करना चाहिए।
समस्या है और समस्याओ पर ईमानदारी से विचार होना चाहिए।

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