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सनातन संस्कृति के क्षरण का मूल कारण हमारी पाश्चात्य सभ्यता की अंधानुकरण की प्रवृत्ति।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ अजय ओझा

राँची/झारखंड( डॉ अजय ओझा, वरिष्ठ पत्रकार) 24 सितंबर।धर्म शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ धारण करना है। इस संसार में जो भी गुण मनुष्य के लिए धारण करने योग्य है, उसे धर्म कहा जा सकता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि हर पदार्थ का जो मौलिक गुण है वह उसमें निहित धर्म है। जैसे पानी का धर्म प्यास बुझाना है।
ईश्वरीय श्रद्धा व पूजा पाठ, ईश्वरीय उपासना, आराधना को परिभाषित करता धर्म शब्द भारतीय संस्कृति और भारतीय दर्शन की प्रमुख संकल्पना है। “धर्म” शब्द का पश्चिमी भाषाओं में किसी समतुल्य शब्द का पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि। “धर्म” एक परम्परा के मानने वालों का समूह है।
लेकिन अफसोस हमारे हिंदू धर्म की संस्कृति को कुछ लोगो द्वारा इसे धूमिल किया जा रहा है जो निंदनीय है जिसमे सुधार लाने की आवश्यकता है हमे दूसरों के धर्म पर कटाक्ष और तुलना करने से पहले अपने धर्म का आंतरिक अनुसरण और पालन करना होगा।
क्या कभी ईद में मुसलमानो को मस्ज़िद के सामने नशा करके अश्लील गानों पर नाचते हुए देखा है?
कभी ईशु मसीह के सामने क्रिस्चियन लोगो को शांताबाई गाने पर नाचते हुए देखा है क्या ?
कभी सिक्ख लोगो को अपने भगवान के सामने, आला बाबुराव गाना लगाकर नाचते हुए देखा है क्या ?
ये सभी समाज अपने अपने इष्ट का मान सम्मान बड़ी ईमानदारी से करते है क्योकि उनको उनके धर्म और उनकी संस्कृति को टिकाना है।
फिर हमारे हिन्दू धर्म के भगवान के सामने नशा करके और डीजे लगाकर अश्लील गाने लगाकर ये भद्दा नाच करने की बीमारी क्यों हो गयी है।
घर मे लाडली बेटी का विवाह है, दूल्हे राजा अपनी होने वाली गृहलक्ष्मी को लेने द्वार पर पहुँचा है और डी जे वाले बजाते हैं – तू चीज बड़ी है मस्त मस्त…
अपनी तो जैसे तैसे… आपका क्या होगा जनाबे आली…🤪
ये कलंक हमारे हिन्दू समाज पर ही क्यों लग गया है या हमने ही लगा लिया। अन्य धर्म के लोग अपने धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक कार्यक्रम में ऐसी फालतूगीरी नहीं करते।
डीजे पर अश्लील गाने लगाकर लाखों रुपया खर्च कर हम अपने ही इष्ट का अपने सनातन संस्कृति पारिवारिक परम्परा का अपमान कर रहे हैं।
हमें अपने त्यौहर बड़े उत्साह और बड़े पैमाने पर मनाने चाहिए साथ ही पारम्परिक वाद्य, ढोल मजीरो, पारम्परिक पोशाक में बड़े ही शान से प्रत्येक हिन्दू त्यौहारों में इसकी वास्तविक भव्यता दिखनी चाहिए।
तभी हमारी सनातन संस्कृति टिकेगी। देखिये आप खुद ही विचार करें, और दूसरों को भी विचार करने लगाइये।
अभी आगे नवरात्रि, दशहरा आदि त्योहारों में ध्यान रखें और कोई ऐसा करता हो उन्हें समझाए समाज के जो कर्ता धर्ता बनकर बैठे हैं उनको भी अपने अपने सामाजिक संगठनों के प्रभाव व दबाव पूर्वक ऐसे करने वालो को बलपूर्वक रोकने का प्रयास करना चाहिये।
फूहड़ गानों की जगह पारंपरिक गीतों हिन्दू भक्ति गीत व संगीत पर आधारित श्लोक व हरि धुन लगाए।
आधे अधूरे, कटे फटे, भड़काऊ वस्त्र पहनना, माता पिता को रूढीवादी बताना, लिव रिलेशनशिप में बिंदास जीवन बिताना, बिना शादी किए अपने होने वाली जीवनसंगिनी के साथ अमर्यादित, अभद्र फोटो विडिओ शूटिंग करा दुनिया को दिखाना आदि अनेक उदाहरण है जो बीमारी केवल और केवल हिन्दू समाज को ही लगी है।
हिंदू संस्कृति का जितना नुकसान स्वयं हमने किया है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है. अफसोस, क्या हम अपने घर परिवार के कोई भी आयोजन में जस मंडली, भजन मंडली, फाग मंडली, महिला मंडली, संस्कृत स्तोत्र उच्चारण करने वाले विद्वानों तथा लोकल व पारंपरिक वाद्य यंत्रों वाले कलाकारों को नही बुला सकते ?
अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ अपने परिवार, समाज, संस्कृति व धर्म से भी जोड़ें।
सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है ! सनातन हिन्दू धर्म संस्कृति का मजाक मत बनाइये !

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