“दुष्यंत हिंदी ग़ज़ल की पहचान है” – हरे राम समीप
“दुष्यंत ने ग़ज़ल कहने का तरीक़ा और तहज़ीब बदल दी।” – आलोक त्यागी
भोपाल/ मध्यप्रदेश 02 सितंबर। दुष्यंत स्मारक पांडुलिपि सभागार में दुष्यंत स्मृति तीन दिवसीय आयोजन का आरम्भ उद्घाटन सत्र से हुआ। कार्यक्रम का सुचारू संचालन घनश्याम मैथिल शुरू करते हुए दुष्यंत और राजुरकर को सम्मान सुमन स्वरूप उनकी याद में एक मिनट का मौन रखा गया।
प्रथम दिवस की शुरुआत करते हुए संयोजक सुरेश पटवा ने कवि दुष्यंत की स्मृति के साये में संग्रहालय के स्थापक राजुरकर राज द्वारा किए गए अथक प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि इसकी स्थापना में राजुरकर और उनकी अनन्य सहयोगी करुणा राजुरकर ने अपने जीवन का मूल्यवान समय और धन अर्पित किया है। इनके जीवनकाल के उस महत्वपूर्ण दौर में गर्भस्थ शिशु के रूप में इनकी बिटिया विशाखा का योगदान भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
इन्होंने इस संग्रहालय को मिलकर खून, पसीने और अश्रुओं से सींचा है।
इनके अनन्य सहयोगी अशोक निर्मल का अंशदान भी कम नहीं आंका जा सकता है। तब आज दुष्यंत संग्रहालय यहाँ खड़ा है।
अध्यक्षता की आसंदी से कवि, लेखक और प्रसिद्ध समालोचक, डॉ. विजय बहादुर सिंह जिन्होंने भवानी प्रसाद मिश्र रचनावली, दुष्यंत कुमार रचनावली और नंददुलारे वाजपेयी रचनावली का संपादन किया है, ने अवगत कराया कि “दुष्यंत आवाम को आवाज देने के उपक्रम में ग़ज़लकार हो गए, उन्होंने ग़ज़लकार होने के लिए ग़ज़ल नहीं लिखीं।”
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रसिद्ध ग़ज़लकार हरे राम समीप ने कहा कि दुष्यंत हिंदी ग़ज़ल की पहचान हैं। इस अवसर पर दुष्यंत की ग़ज़लों को गुरमुखी भाषा में अनुवाद करने वाले शायर सरदार सुखराज ने दुष्यंत की ग़ज़ल की बारीकियों को अनुवाद करते समय महसूस हुई महानता को रेखांकित किया।
विशिष्ट अतिथि दुष्यंत के पुत्र आलोक त्यागी ने कहा कि “दुष्यंत ने ग़ज़ल कहने का तरीक़ा और तहज़ीब बदल दी।” उन्होंने पिता दुष्यंत से जुड़ा संस्मरण सुनाया कि उन्होंने चिर परिचित कविता का मैदान छोड़कर ग़ज़ल की तरफ़ जोखिम भरा कदम उठाया। उस समय मैंने दुष्यंत में एक क्रांतिकारी बदलाव देखा था। उसी कदम ने उन्हें अमर कर दिया।
इस अवसर पर संग्रहालय की सचिव करुणा राजुरकर ने दुष्यंत का गीत “ज़िंदगी ने कर लिया स्वीकार अब तो पथ यही है” प्रस्तुत किया और यादों की कोरों से साझा किया कि यह गीत ही दुष्यंत स्मृति संग्रहालय की नींव का गीत है। विशाखा राजुरकर ने दुष्यंत पर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखित “वह सब कुछ पा लेना चाहता था” आलेख का पाठ करके दुष्यंत कुमार को याद किया।
कार्यक्रम में राजेश बादल, गोकुल सोनी, अशोक धमैनिया, किशन तिवारी, चरनजीत कुकरेजा, प्रेमबगुप्त, महेश अग्रवाल, बिहारीलाल सोनी, दिनेश मालवीय, विजय वाते सहित अनेकों साहित्यकार बंधु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
