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मुक्तांचल के स्वर्णिम 50वें अंक का लोकार्पण, ‘साहित्यिक अड्डा’ में कोलकाता की सांस्कृतिक विरासत पर गंभीर विमर्श।

हावड़ा/पश्चिम बंगाल ( मनोज कुमार प्रसाद)14 जुलाई। विद्यार्थी मंच एवं मुक्तांचल के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को मुक्तांचल पत्रिका के स्वर्णिम 50वें विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ का लोकार्पण समारोह एवं ‘साहित्यिक अड्डा’ का आयोजन हावड़ा में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में कोलकाता के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, आलोचकों, शिक्षाविदों, रंगकर्मियों, पत्रकारों, शोधार्थियों और युवा रचनाकारों ने शहर की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत, हिंदी साहित्य की परंपरा तथा समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुक्तांचल की संपादक एवं विद्यार्थी मंच की अध्यक्ष डॉ. मीरा सिन्हा के स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने कहा कि विशेषांक ‘कलकत्ता से कोलकाता’ केवल एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि दो सदियों के बीच बदलते समय, समाज, संस्कृति और साहित्य की यात्रा का दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि इस अंक में अतीत और वर्तमान की विविध गतिविधियों, महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों और उनके कृतित्वों को समेटने का प्रयास किया गया है।
प्रख्यात आलोचक एवं विचारक डॉ. शंभुनाथ ने मुक्तांचल के पचास अंकों की निरंतर प्रकाशन यात्रा को महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाएँ समाज की वैचारिक चेतना को जीवित रखती हैं। उन्होंने हावड़ा की साहित्यिक परंपरा, जन-सांस्कृतिक आंदोलनों और हिंदी साहित्य के संघर्षशील इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल युग में संवाद और आत्मीयता को बनाए रखने के लिए ऐसे साहित्यिक आयोजन अत्यंत आवश्यक हैं।
वरिष्ठ आलोचक डॉ. अमरनाथ ने कोलकाता की सांस्कृतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि समय के साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन आया है, लेकिन साहित्य आज भी समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। उन्होंने मुक्तांचल के वर्तमान स्वरूप की सराहना करते हुए इसे गंभीर, परिपक्व और संग्रहणीय पत्रिका बताया तथा डॉ. मीरा सिन्हा के संपादकीय दृष्टिकोण की प्रशंसा की।
डॉ. अमित कुमार ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना ‘कलकत्ता’ होता है। यह शहर केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि संघर्ष, संस्कृति, विचार और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत प्रतीक है। वहीं सुप्रसिद्ध कथाकार शर्मीला जालान ने कहा कि मुक्तांचल, भारतीय भाषा परिषद और अन्य साहित्यिक मंच समाज में सकारात्मक वैचारिक वातावरण का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ शहर, समाज और संस्कृति पर गंभीर संवाद संभव हो पा रहा है।
कार्यक्रम में डॉ. पंकज साहा, महेश जायसवाल, मृत्युंजय श्रीवास्तव, डॉ. चित्रा माली, सुरेश शॉ, प्रकाश अग्रवाल, डॉ. विजया सिंह, जितेंद्र जितांशु, मीनाक्षी सांगनेरिया, विनय जायसवाल, दिव्या प्रसाद सहित अनेक साहित्यकारों ने कोलकाता के साहित्यिक इतिहास, स्त्री-विमर्श, रंगमंच, पत्रकारिता, सामाजिक परिवर्तन तथा हिंदी साहित्य की वर्तमान चुनौतियों पर अपने विचार रखे।
साहित्यिक सत्र में वरिष्ठ ग़ज़लकार सेराज ख़ान बातिश ने अपनी नई ग़ज़लों का प्रभावशाली पाठ किया। विद्यार्थी मंच के सचिव विवेक लाल ने अरुण कमल की चर्चित कविता ‘जाऊँगा मैं जाऊँगा, कोलकाता जाऊँगा’ का सस्वर पाठ किया। वहीं विद्यार्थियों रागिनी पांडेय, स्वराज पांडेय, सुकन्या तिवारी, राव्या श्रीवास्तव तथा रोहित शर्मा ने कविता-पाठ कर श्रोताओं की सराहना प्राप्त की।
इस अवसर पर गाथा प्रकाशन से प्रकाशित चौथे तार सप्तक के वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज के नवीन कविता-संग्रह ‘अंत नहीं, अंतिम नहीं, कुछ भी’ का भी लोकार्पण किया गया। वक्ताओं ने इसे समकालीन हिंदी कविता में मानवीय संवेदना और जनपक्षधर चेतना का महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह बताया।
वरिष्ठ समाजसेवी रामनिवास द्विवेदी ने मुक्तांचल की निरंतर साहित्यिक यात्रा की सराहना करते हुए इसे हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। कार्यक्रम का संचालन विनोद यादव ने किया तथा अंत में मुक्तांचल के प्रबंध संपादक सुशील कुमार पांडेय ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, विद्यार्थियों एवं साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया। समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, पत्रकार, रंगकर्मी एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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