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कदम

कदम

वीर, दोसर ना एक बात सिखइहें, सारा काम अगिअइले होखी,
ऊ जिनगी का जिनगी अइसन, जहवा ना तनिको हलचल होखी।

ना रहे ताप घाम भूभरी में, ना जेकरा में गरजो तड़प होवे,
सुख लेबह से रोकी दुनिया, जब मजगर कम्पन ना होवे।

साँचे चंदन टीका भभूत लपेटले, बा नीरस उदास जे बइठल,
तज द ओह बेकार चिठल्लन के सब झूठ में बाड़न डूबल।

छोड़ऽ बनल वैरागी अब, दूनों बाँह कसके चमकावऽ,
चट्टानन के छाती चीरत, दूध निकाले खातिर धावऽ।

एह पत्थर के काट मोम अस, रूकल धार के आगे लावऽ,
अमरित कलश छीन चांद से, तू आपन ताकत दिखलावऽ।

परबत माथ पर चढ़ बइठ के, घट-घट अमरित पीअऽ,
योगी बन निट्ठला मत बइठऽ, जीअ त विजयी बन जीअऽ।

रसगर मस्ती बीच डूब के, छँहगर में मत वास बनावऽ,
माया-मोह मौज के बीचे, असली मतलब मत बिसरावऽ।

लोभ लालच के घुसते, पतन तोहरो होई,
मौज मनावल ना लक्ष्य, निशाना जीते के होई।

जुम्भक ऋषि, रास लीला के वेद मंत्र मत गढ़ऽ,
लाल-पियर गमकत फूलन के, गमक बेहोशी छोड़ऽ।

समय माफ ना करी, टूट रहल बा धीरज, अगिआइल बा,
चिनगारी जब उठी, ना बच पइहें फूल, लागी राख भर बा।

चिनगारी से लगल आग, अब अजबे नीमन लागत बा,
रति के चाह पलंग के साथे, आग बीच अब नीक जलत बा।

मत होखस बेहोश होशवाला, आपन अंजोर से नभ चमकावस, अगिआइल एह भट्ठी में, तपा-तपा सोना अस चमकावस।

कोमल-कली सेज संगिनी ना, लाल कली अंगारे बाड़ी,
बाँह बीच लपटइहें ना लत्तर अस, ई वीर-बाला बाड़ी।

बीच जवानी जब लपलप डोले लगिहें, जनिहऽ बस शराब के अरघ बा,
जब ललकारी लोगन के, जनिहऽ युद्ध के ज्वाला बा।

वीर-बाला सब जानेली, कइसे वीरन के मुंडमाल देवे के,

 योद्धा जब थाके लगिहें, जानेली रथ-चक्का बीच हाथ डाले के।

मरद चाहस रूपगर मेहरारू, ऊ तेज पुरुष बस चाहेली,

मरदा चाहे गोर मुलायम देह, ऊ चरित्र बल चाहे ली।

खूँट जोड़ावल होवे, भले नपुंसक मरदा से, 

मेहरी माने ना ऊनका मरद, कबहुँवो मन से।

नारी मन जीतल चाहऽत, समर जीत के आवऽ,

 रण बीच जान जाये त जाय, पीठी गोली लागे ना पावे।

 

नीक प्यार त, बलिदान के बीआ ह डालल,

 प्यार से ढेर बढ़िया, तलवार में तेजी ह ढालल।

 

चाहीं अइसन प्यार ज्वाला भड़कावे बल भरे,

 सूरज के चढ़त किरण में, ताकत के अंगार भरे।

 

का तपत रेत में रस ना होला?, बेसक रहेला, छीपल रहेला, 

अन्धड़-तुफान के बीचे, जल-कण के अमरित होला।

 

चाहे जान भले चल जावे, आन कबो ना जाये पावे,

नभ के फाटे पेट भले, पर ना कबहुँ अन्याय नवावे।

 

काल गाले धरबो करी त, बार बार ना एके बार,

रोज-रोज मरला से अच्छा, मरबो करीं त एके बार।

 

बढ़ चले के डेग बढ़ावत, काल के देह नाप डाले के,

जिनगी जीअल चाहऽ, तब मरे से कबहूँ ना डरे के।

 

रहीं आजाद हमेशा, लोगन के एकही धुन होला,

जब तक रही ललाट भभकत, आ बल गट्टा में होखे, 

तबे तक नर-नारी जवान, आ जवानी के जोर रहे। 

कहहूँ लायक होला प्यार, जब जवानी के लहर में उठान होखे, शराब के गागर बेकार, जब नशा से पाँव लड़खड़ात होखे। 

पाँव जला, भूभरी में काम टपकत माथ दउड़-दउड़,

 मन पसीना से अब तर अन्धड़ भर पीअत, 

जीवन-हवा करे के, करे के। झाकड़ में, भरे के।

ई ना बात बनावट के, अन्दर के एगो गुण होला।

बज्र मार पड़लो पर तन में, तनिको कबहूँ नवन न आवे,
जग में बा उहे स्वछन्द, जे कबहूँ ना माथ झुकावे।

छोड़ऽ धरल पाँव पर माथ, बाकिर वीरतई मत छोड़ऽ,
जलहूँ पड़े लाह के घर में, तबहूँ आन मत छोड़ऽ।

जिनगी धीम बन जाई, जहाँ गुलामी आइल,
आजाद रहे के सीखऽ, नीक होला जूझल मरल।

मुक्त रहल, ना कबहूँ उलझन रहे, ना रही,
एके उपाय बा, कबहूँ-कबहूँ ना, हरदम जागल रहौं।

रहीं हमेशा सावधान, चौकसी बराबर देत रहीं,
तीर-कमान रोज-रोज, फिर कइले धरगर तेज रहीं।

ऊ कइसन आँधी, जबना में लहर ना रही,
ऊ छाती ना छाती, जवन गोली से डरत रही।

खून बहावल छोड़, ने डर से लोर ढरकइहें,
तब ओह देश के, गुलामी कबहुँ छोड़े ना पइहें।

जब जब मान सम्मान पर, लागी चोट गोहिड़ार,
तब स्वाभिमान से अपने उपजी नीक ललकार।

जवन लोग के, दुख ना कबहू पीछा छोड़िहें,
सहते-सहत, दुखवे उनका बलवान बनइले रहिहें।

ठेस लागे त लागो, मत रूकऽ, राह में तन के चलऽ,
समय बुझाय खराब त, राह के रौंदत चलऽ।

बाघ छाल में होखस गीदड़, भा भोंकत कुकुर मिलस राह में,
जे धेनुहा-बाण, तीर-कटार के छोड़िहें,
पत्थर पुजत मंत्र पोथी के पढ़त रहिहें,
बस मंजिल पहुँचे के चाहीं, जानवरन के चलते मत रूकऽ राह में।

साधु बनबऽ तबहूहूँ, जानवर काटल ना छोड़िहें,
तोहरा साथे, कंठी माला चबा के छोड़ि हें।

जे सोझा में बडुवे, ओकरे झूठ बतलावत रहिहे ,
उनका काबू में, ना जिनगी रही ना दुनिया रहिहें।

जिनगी के सच छोड़, जे मरण बाद मोक्ष देखावत रहिहें,

मोक्ष बस सपना ह, ना केहु देखल, ना केहु देखिहें।

धरम धुरन्धर, बस शांति के शंख बजावत बाड़न,
बिना हिलवले देह, रोक सांस, वैरागी बनावत बाड़न ।

धइले धीरज रहीहऽ कह मारेलन, माफी दे दे फुलल रहेलन,
गुस्सा पीयल, माथ नेवावल, ह जीत के राह बतावेलन ।

ऊहे घइला भरल अपमान के बूंद-बूंद घोंट जईहें,

अइसन जाति-मुल्क, अंगार से खेलल ना चाहे,
लूंज-पूंज अनुमान अनदेखल ज्योतिष पर चलल चाहे।

काहे ना लातूर के पतरा खोललन, ना भूकम्प भूज,
उत्कले के बोललन, सागर दु लाख सुनामी में निगलल,
बाकिर ज्योतिष के मुँह ना खुललन।

जय जजमान बोलत रहीहैं, अन्दर से गुलाम हो जईहें।

अइसन धरम पालल धीरकार, चाहे जतना सोजहग होवे,
रण से मुँह चोरावल ना ठीक, चाहे शांति के जतना पूजा होवे।

धधकत खिलल जवानी के, ईहे राख कर दीहें,
बदला में सोना-चाँदी साथे, चाँदों बटोर लीहें।
जब तक रसगर मिलत रहीहैं, काम-धाम छोड़ नाम भजन में रहिहें, हाथ-गोड़ कुब्बतगर रहलो पर, कान्ह कुदाल, बाण हाथे ना धरिहें।

जेकरा पास अतुल बल, ओकरो मुलायम मक्खन बना के छोड़स, कंस- दमन गिरिधारी, के, मोहन, बंसीवाला, गोपीबल्लभ कहस।

छिरकऽ पात पल्लो से कलशजल, गरम जोश नीके ठंढावस,
ना गोविन्द सुभाष भगत के, लक्ष्मी पतये नमः पढ़ावस।

अग्रते सकलम् शास्त्रे, पृष्टते सशरः धनु, ई. पाठ पढ़ावल गइल भूलाय, अब पेटे पुआ पीठी छन्ना,
झोला भीतर शालिग्राम रखाय।

बा साँच बात ना झूठ तनिक, जल से बडुवे ई धरा बनल,
पर जान लिहल चाहीं नीके, पानी से पहिले रहे अनल।

जल, थल, पावक, पवन, अम्बर में, पुरहर पहिले रहुबे हलचल,
अर्जुन प्रेरक मधुसुदन लग, हथजोड़ी ना, रहुवे चक्र सुदर्शन बल।

असली ब्रह्म उर्जा ह, जिनगी ओही तरंग पर चलत बा,
अबहीं समझ में आइल, जिनगी ओही पर चलले चलल बा।

के कहेला, आग खाली दुनिया के जार क्षार करे ला,
चाल-ढाल सुघर राखे खातिर, शक्ति बस आग बनेला।

भोला ना खाली अवघड़ दानी, शक्ति-गउरा साथे लम्बोदर के गढ़लन,
मुषमोदक के साथे फरसा गढ़लन,
डमरू चान के साथे बैल, नाग, पास में रखलन।

पुष्प पराग कुमकुम रोली गढ़ल, ई का कवनो रचना ह?
पड़े अकाल झुलसस बीचड़ बीच खेत, तब ठीक हँसुआ, खुरपी गढ़ल ह।

मन्तर पढ़ल बेकार, आरती झूठ, जब हवन कुंड के आग सुलगा ना पाई,
जेकर बल से पाप नाश ना होई, किरतन-भजन बस भीखमंगन के रही रूलाई।

अंगुरी चिर जे करी लहू के टीका, चन्दन से जादे बढ़िया लागी,
माता, बहन, संगिनी ओइसने वीर के आरती घुमावे लागी।

जब तक राक्षसी-रोग मारल ना जइहें, कइसे पाप धोवाई?
जबहीं पाप धोवाई, आदमियत के सुघड़ रूप उग आई।

तनिका सोचऽ, धरम के रूप कइसन होला ?
झलके लागी, जइसन रूप जव-कुश के होला।

ईहो हउवे सच, अन्याय अधर्म के नाश फरसा से होला,
बाकिर जब फरसा रही मुरहल, तब का ठनिआई?
मुरझाइल कुश-डाभ में कोंपल , का कहाँ से आई?
धरम बचावल चाहऽ त, बाजू में ताकत ले आवऽ,
लोर ढरकावल छोड़, हिम्मत से हौसला बढ़ावऽ।

भेड़ मेमिआला दुखे, शेर काहे ओकरे खुन पीये?

काहे ना राखे नोह-दाँत मुलायम,खाली तेजगर राखे।

भेड़ के रोवला से, शेर का दाँत तोड़ी? ना करी भलाई भेड़न के, उनकर फफेली ना छोड़ी।

बस एके बा राह, झरपेटले शेर के ढ़ाही मारऽ,
भेड़न नियर मेमिआइल छोड़, बाघ पर ललकार के परऽ।

बाघ के आँख में आँख डाल के अड़ल रहऽ, उहो डर जइहें,
बाघ पास बाघ बन रहऽ, बरिआर के बरिआरा ना खइहें।

साँच के सँच जानल ठीक, झूठ के फोरा में मत पड्ऽ,
जे निगले पर पड़े, ओकरे निगले पर पड़ ऽ।

पोंछ डोलावल बड़का पास, गमला में डालल पानी अस,
फुलवारी-गमला के गाँछ कतना टाठ, का जंगल अस?

जे दुनिया में मंजल रहेला, उहे लोग जियेला,
जे मेमिआइल छोड़े, ऊ दुश्मन के रक्त पियेला।

जब-तब शांति खातिर, कबूतर नभ में छोड़ल गइल,
उनके से फिर जादे आस लगावल गइल।

पर काहे ना छोट बात, उपरिन के तनिक बुझाला?
उजर कबुतरन में बडुवे, छीपल अजबे ज्वाला।

फिर बाटे कबूतरन के पंजन में, धइल धार रें होले,

कइयन के तन में फिर धइल बारूद रे होले।

पंचशील के पाठ पढ़ला से कहाँ उम्मीद के शांति आइल,
भाभा के पोखरन से, आ पोखरन से ही आई।

खाली चप्पल गढ़ला से, ठीक बा काँटा पाँव ना गड़ी,
पर अइसने लोगन के, केहू मुंड़ी काटे पर पड़ी।

बड़ा गुमान रहेला शांति के दूत कहावे खातिर,
कंठ छोड़ घंट में पानी दे दे, तैयार रहेला मुंड़ी छिलावे खातिर।

विलपत दस दिन नेहइला से, पुण्य ना बढ़ी रचिको भर,
कुछ ना मिली तिल, चाउर, गुड़ के धोंधा धइला से,
मिली त बस ताल ठोक समस्या से जूझला पर।

बा पुण्य-पुण्य बक रहल, रे इनका के कुंभ नहाये द,
थाक चुकल जइसे जग बा, ओसहीं उनका थक जाये द।

हम देख चुकल बानी इहवाँ, निमना से पुण्य कमा के,
अब झख मार के बइठल बानी, सब्र आ सब मान गंवा के।

ऊ आपन गरमी ठंढावस, तू भीतर के आग जगावऽ,
ऊ भले राम के नाम जपस, तू अपना के राम बनावऽ।

जे ताकत पर बा बलशाली, ओकर ऊहो हँसी उड़ावस,
ऊ अइसन वीरन के देख, संत पद अइसन सानत बात बढ़ावस।

लाम दांत वाला लम्बोदर के, सितुहा भर-भर दूध पिआवस,
लाल लंगोटी वाला’ के, मन मन भरके केक चढ़ावस।

बोल पड्स माला फेरे के तेज गंवा ढंढावे,
के लाठी, डंडा, हथियार छोड़, खाली डाँगर बन जाये के।

पर शेर भला कबहुँ अइसन भेड़न के बात सुनी?
आ जियल छोड़ मरदाना ई, काहें मउवत के राह चुनी?

माला जपिहें जे बइठ कुशासन, बस खाली लोर ढरकइहें,
ना मिरगा बस देखते शेर के, भय से चुप परइहें।

ना मिली शांति घिधिअइला से, ना दसो नोह ऊ जोड़े लागी,
निमन दिन लइहें बस वीर, लइहें दिलेर बरजोरी।

तब मरखाहो साँढ़ काँपी, पशुता भागी, जब शूर कमान सम्हाली, बेसक धरती पर होई तब, सुख शांति के भल बहाली।

ना आवेला शांति सिर्फ, कइला भर से हथजोरी,
सबसे बड़ दुश्मन ह देश के, आपन कमजोरी।

ऊ निष्ठुर निर्लज्ज समाज पर बोझा बनल रहेलें,
जियते लाश बनल अन्हकर कान्हे लदल चलेलें।

उनकर अइसन लागे पेट, बड़ कोहड़ा के बाड़े लिलले,
झरल बतीसी बाटे, बाकी जीभ से हलवा पुड़ी गट-गट लिलले।

वीरन पर गदहा अइसन, तू आपन बोझ मत डालऽ,
तोनईल बनबऽ त बनऽ, बाकिर आपन भार संभालऽ।

ना खाली अयश दिलवाई, ई बड़का अन्याय कहाले,
ना जाने कइसे दुनिया ई, अइसन नौटंकी देखत रहेले।

अबहीं रहबऽ लदल अगर, फिर पीछे पछतइबऽ,
जियते मुर्दा बनलऽ अपने तब, लाशे भर रह जइबऽ।

ना बा जिनगी के आशय रे, केवल हीक भर माल बनावल,

का उद्देश्य केवल दर्शन,? आ खाली मन माधुर्य बनावल?
पोथी-पुरान, भजन-प्रवचन से, नीक राह बडुवे विज्ञान,
ना चाहीं मोक्ष के सपना, जियत रहीं चाहीं बस जीवन।

रस उहे अमरित, जवना में ना पाप फेटाइल होवे,
आजादी के रस नीमन, जवना से वीरन के जिनगी रसगर होवे।

ऊ जिनगी ना जिनगी, जवन ठहर ठहर के चले,

पक्का सबूत एकर, कि आग हरदम जलत रहे।

बिन बनले खुद आग, पासे मत जइहऽ, जल के राख हो जइबऽ, सेतिहे जरल जिनगी के का, धरम-हवन कहहूँ भर पइबऽ।

धधकत रहे सदा मजीगर में, अइसन जीवन ज्योंति जलाईं,
पथ के बाधा-विरोध निर्मम सब रौंदत बढ़ जाई।

ई जिनगी धधकत ज्वाला से, अपने आप जलल बा,
भा उफान मारत तरंग से, आप स्वयं मचलल बा।

कहाँ अनेरे फेर अंजोरिया, भउर में खोजे जइबऽ,
बलुक आग होई उहँवे से, तू अपने ज्योंति के पइबऽ।

अति कोमल सुकुमार कली, आ नरम नरम पतई टुसिआइल,
बा अनेर यदि तना पेड़ के, डापुट ना होवे बकुआइल।

ततने पाप बढ्ला, जतना धन-दौलत बढ़ियाला,
हक-हिसाब के माल बिना, जीवन गरीब के छितराला।

सम्मान, मान आ यश, कृति, सब कुछ इहवे वाली,
तनिकी भर गुड़ सेवे वाला, लवण लाम बा खाली।

रे नाँव गाँव के फिकिर छोड़, आ तज के सब मान बड़ाईं,
बस खाली रे एकमात्र, जीवन खातिर बैरी से ठान लड़ाई।

अट-पट बा लागत आज, कुछ मुश्किल बड़ा कहल बा,
ना जाने भारत में भईथा, कइसन हवा बहल बा।

ढोंगी कपटी सब पड़ल महल में, गमला फूलन अस मुस्कालें,
गेहूँ, अरहर जइसन गरीब, सूखले माटी में दुबरालें।

जब जहर विषमता के समाज में, असहीं फैलत जाई,
फिर कइसे होके एक देश ई, दुश्मन से फरियाई।

सबसे पहिले मिलजुल के, हम जरगरं पाप मिटाई,
ऊँचा-खाला कोड़ काड़, लग निमना ले भहराई।

बरगद के पसरल बरौह के, नीके करीं छंटाई,
मिले पावस अमरित, ओकरा के सब के लग पहुँचाई।
जब तक घोर विषमता के, रही देश में खाई ,
तबतक देश रही कमजोरे, ना कबहुँ बल पाई।

बड़ा भाग्य के बात आज बा, जनसागर में हलचल उठल,
मथा रहल बा फेर, मथानी बनल वीर मंदराचल।

अरे विषमता के रसरी में, धनी-गरीब बा लागल,
अउर मथाते माखन उपर, तरे रहल कुछ बाउर भल।

ई बढ़त विषमता के दिल सगरो, बा जारत जग सारा,
रूकऽ तनिक, लगले पइबऽ तू, अमरित के पवनारा।

पर होके नीक सजग अपने, उनका के बतलाई,
धनी दानवन के हाथे मत अमरित कलश गंवाई।

मथहूँ में हम जोर बराबर लवलीं ऊ तोनइल से कम ना जोर लगवलीं।

माहुर केहू के, केहु अमृत घट ले भगलें
ऊ जयंत तबहूँ देव पुत्र कइसे कहाते रहलें?
इहे जयंत पंचवटी में माँ सीता के चोंचे घहिअइले
पता ना, ना इंसाफी कर, भागे में कुछ अमरित के होइहें पीयले।

राम के शर पीछा जे कइलख कतहूँ शरण ना पवले,
राम भले बकसले जान, बाकिर इनकर एगो आँख निकललें।

एने रहन देव पुत्र ई, ओने बाप देवतन के राजा,
सती अहिल्या संग का कइलन, गौतम ऋषि से पवले सजा।

लेब बांट सम भाग सुधा में, लरकल बानी पर पी करके,
देब जहर में हिस्सा उनका, जादे ना पर देव बाँट बरोबर।

श्रम सम, अमरित घट ले भगिहें, हम छीनब बरिआरी ,
छीना छीनी में छलकी त छलको, ऊहवें लागी कुंभ देखी दुनिया सारी।

खून-पसीना एक करीं हम, ले उड़ा ऊ घटर-घटर गटकावस,
ढेरे बाड़न अबहूँ जे कलशा पेनी चाटत रहस।

जहर जला ना पइहें, भोलेशंकर एहिजे बाड़न,
कंठ बीच देखऽ अंटकवले, कइसे जगत बचइले बाड़न।

अगर विषमता रहल देश में, शांति कहाँ से आई,
रण में सीना तान खड़ा फिर, महाभ्रान्ति चिचिआई।

आँधी तूफान के बीच, मस्ती के चढ़ल रहे नित पारा,

अउर नया कलंगी के ऊपरे, खिले लाल अंगारा।

दायाँ-बायाँ के भेद आज हम, आपस के मिल पाटी,
दुश्मन सोझा में पड़स उनका के नीके केहुनाठी।

होखस चाहे सौ भेड़िया, जे सोझा में आई,
उ भारत से जीयत बाँच के, कबहुँ लौट ना जाई।

रे देत सुनाई शंकर के, धेनुहा के बा टंकार इहाँ,
आज हिमालय के ढलान में, लउकत बा अंगार इहाँ।

लोहित में कबहूँ के गिरल, उ कड़कत आज कुठार इहाँ,
हर के तांडव से आवत बा, ई ललकरले ललकार इहाँ।

देखी जग, कइसे आज धरम के भाग्य जगावल जाता,
आदमी के करतब से कइसे, नागन के फण कुचलल जाता।

द्वारकानाथ, बद्री केदार, रामेश्वर सबके हम गोहराईं,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, गुरुद्वारा सबके आज जगाईं।

जय जय बजरंगी जय अड़भंगी, जय शिवा महाबली की,
जय पैगम्बर, बुद्ध, ईसा, जय दुर्गा, तीर्थंकर महावीर बली की।

जय गुरुगोविन्द, सुखदेव राजगुरु आउर शहिदे आजम की ,
जय जय कृपाण, जय जय कुठार, जय एटम बम बारूदन की।

मउवत बीचे महाकाल के, बोलब हम जयकारी,
सत श्री अकाल, सत श्री अकाल, ईहे घोष गुंजाइब भारी।

जोश बढ़वले करत रहब, हम सीमा के रखवाली,
मां के नख-शिख से एको इंच ना देब, प्राण के भीख ना मांगब, प्रण बा काली।

देशवासियों, विषमता के चण्डालन के रक्त खप्पड़ में पीअत रहऽ
एह रक्त बीज के खून, धरती पर गिरे ना पावे, पनपे ना पावे देखत रहऽ।

जय जनतंत्र, जय प्रजातंत्र, जय सीमा प्रहरी बलिदानी की,
जे उनकर, हक खातिर केहू से ना रही डरत,
जय जय जल, जंगल, जमीन की, जय जन जन की कुर्बानी की।

जे गरीब खातिर रही बोलत,
जे हरदम सही राह अपयश,
घृणा, निंदा से रही लड़त, पर जे निसदिन रही चलत,

जे दासता के राह ना चुनी, ऊ गुलाम ना होई।

साँच के साँच कहे खातिर साहस त करऽ,
साथ सच्चाई के देबे के शुरूआत त करऽ।

हड़‌पे वाला के खखबरदार जे करत रही,
अनाचार, अत्याचार पर जे कड़कत रही,
जे अन्यायी पर शोला बरसावत रही, ऊ कबहू गुलाम ना होई।

रचनाकार: डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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