रात की बात
(30-6-01 रात्री 1.45 बजे रात का)
रात को सोया था, सपनों में खोया था,
क्या था, क्या हो गया, बीते क्षणों को देख रोया था।
वह आयी, दरवाजा थपथपायी और यह चरमरा गया;
देख भयावनी सूरत डरा, सकते में आ गया।
उसने झकझोरा, कहा बिस्तर छोड़ो, मुँह मत खोला, जल्दी करो, कुछ मत बोलो, रोना है अकेला ही रो लो।
सामने मौत का खौफ, सोचा बीबी बच्चों को जगा हूँ,
भाई-भतीजे को गोहरा दू सन टी. भी. को बुला लू।
ज्योंहि काला चश्मा चढ़ाया, देखा, गोहार जुट गया, बवाल मच गया, चश्मा छटका, दस्तावेज कहाँ ?
फिर हाथों से हाथ भीड़ गया।
पूछने लगा गोहार, क्या रूक नहीं सकती, क्या हो रहा है।
बाबूजी बिना अन्डर पैंट के हैं, क्या अच्छा लग रहा है ?
क्यों रूकूँ, तारीख बदल जायेगा, मास बदल जायेगा,
जून से जुलाई हो जायेगा,
भोर होते ही भद्रा लग जायेगा,
रात्रि गिरिजा पूजा की बेला है,
भोर विष्णु पूजा में बदल जायेगा।
मजे के वक्त रोशनी बुझा दी जाती है, इसीलिए रात्रि में, नहीं तो मजा क्या आयेगा।
भीड़ मत लगाओ, काम अकेले लायक है,
नहीं तो तुमसे भी निपट लूँगी;
जिनके लिए आयी हूँ साध पुराने, पहले दो-दो हाथ कर लूँगी।
मौसम बरसात का, रात अंधेरी, घटा घेरी, काले मेघा, ये फुहार, रात का तीसरा पहर, बादलों से ज्यादा काले
ये झील नुमा दो कजरारे नैना, उभरे गाल, होठ लाल लम्बे बाल उम्र को चिढाते ये काले के काले बाल।
नाटी पर खाटी, ब्रहमचारी के ताप से जली-भूनी, धधकती अंगारा सा, अब चैन नहीं इस रैना।
गार्डेन से खुशबू लिए ओलिभर तक आयी हूँ, जो चाह है अबतक भी नहीं पायी हूँ।
बहुत दिनों से बिना साड़ी में रही सोचती; बिना अन्डर पैंट के हैं जो था करना, और भला जिसे थी खोजती।
जितना जिता मजा मुझे, उतना उन्हें भी, उभड़ा प्रेम था उधर, तो कगार तोड़ इधर भी।
देखते-देखते मैं जेल में और वह थी गुरूभाउर मंदिर में, पहले भी मैं मंदिर के बाहर था, और वह थी अयोध्या मंदिर में।
नींद खुली, देखा एक मोटी थुलथुली, कुआरी औरत मेरे पीछे पड़ी है,
फ्लाई ओभर पर, सैंडिल दाबे रातों-रात खड़ी है।
इन्द्रप्रस्थ के इस्पाती घुटना वाले के, पत्थर से पता नहीं कुंआरी घायल हुई या नहीं,
एक बीबी घायल हुई जरूर,
पता नहीं, न्याय हुआ या नहीं।


