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भोपाल:मानव संग्रहालय में माह का प्रादर्श।

पारंपरिक छाया चर्मपुतली “राम” प्रदर्शित।

भोपाल/ मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद) 20 मई। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में,“माह का प्रादर्श” श्रृंखला के अंतर्गत महाराष्ट्र की पारंपरिक छाया चर्मपुतली “राम” नामक विशेष प्रादर्श का उद्घाटन आज अपराह्न 3:00 बजे सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रोफेसर पराग दुबे, प्रबंधन संकाय, राष्ट्रीय तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (एनआईटीटीआर), भोपाल रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. पराग दुबे द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया। इस अवसर पर संग्रहालय के निदेशक प्रो. अमिताभ पांडे ने मुख्य अतिथि का पुष्पगुच्छ एवं संग्रहालय का प्रतीक चिह्न भेंट कर सम्मान किया।
कार्यक्रम में “माह का प्रादर्श” की संयोजक रश्मि शुक्ला ने प्रादर्श का विस्तृत परिचय प्रस्तुत करते हुए बताया कि “राम” नामक यह पारंपरिक छाया चर्मपुतली वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले के पिंगुली गाँव से संकलित की गई थी। यह ठाकर जनजाति की विलुप्तप्राय लोककला परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र की “चामड्याच्या बाहुल्या” परंपरा भारत की प्राचीन छाया चर्मपुतली कलाओं में से एक मानी जाती है, जिसमें दीपक की रोशनी तथा चमड़े से निर्मित पुतलियों की छाया के माध्यम से रामायण के विविध प्रसंगों का मंचन किया जाता है।
डॉ. रश्मि ने पुतली निर्माण की पारंपरिक प्रक्रिया, प्राकृतिक रंगों के उपयोग, प्रस्तुति शैली तथा ठाकर जनजाति की कथावाचन परंपरा पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस कला में बकरी के चमड़े से निर्मित पुतलियों को बांस की पतली छड़ों की सहायता से संचालित किया जाता है तथा प्रस्तुति गणेश वंदना से प्रारंभ होकर रामायण के विभिन्न प्रसंगों तक पहुँचती है।
महाराष्ट्र की यह विलुप्तप्राय पारंपरिक छाया चर्मपुतली कला ठाकर जनजाति समुदाय से संबंधित है। यह समुदाय कुशल शिल्पकारों का समूह है, जो अनेक लोककलाओं में दक्ष माना जाता है। प्राचीन काल में इनका मुख्य व्यवसाय गाँव-गाँव भ्रमण कर कथावाचन के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करना था।
यह चर्मपुतली कला महाराष्ट्र की “चित्रकथी” परंपरा अर्थात चित्रों के माध्यम से कथा कहने की शैली का एक रूप है। इसमें बकरी के चमड़े को काटकर आकृतियाँ तैयार की जाती हैं तथा पर्दे के पीछे दीपक के प्रकाश से उत्पन्न पुतलियों की छाया के माध्यम से कथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।
अधिकांश प्रस्तुतियों में रामायण के विभिन्न प्रसंगों का मंचन किया जाता है। यह भारत के विभिन्न भागों में प्रचलित चर्मपुतली परंपराओं का सबसे सरल रूप माना जाता है, इसलिए इसे छाया चर्मपुतली का प्राचीनतम स्वरूप भी कहा जाता है।

निर्माण प्रक्रिया

पुतली निर्माण के लिए पूर्व में हिरण की खाल का उपयोग किया जाता था, किंतु वर्तमान में बकरी के चमड़े का उपयोग किया जाता है। चमड़े को नमक एवं गर्म पानी के मिश्रण में डालकर साफ किया जाता है तथा दीवार पर फैलाकर कीलों से जड़ दिया जाता है। पुनः सफाई एवं सुखाने की प्रक्रिया के बाद इसे पारदर्शी होने तक घिसा जाता है।
इसके बाद पात्रों के चित्र अंकित किए जाते हैं तथा पतली छेनी और लकड़ी के हथौड़े की सहायता से छोटे-छोटे छिद्र बनाकर वस्त्र एवं आभूषणों की आकृतियों को उकेरा जाता है। तत्पश्चात दोनों ओर स्थानीय रूप से उपलब्ध लाल, नीले, हरे एवं काले प्राकृतिक रंगों से रंगाई की जाती है।
पुतलियाँ बिना जोड़ के चमड़े के एक ही टुकड़े से बनाई जाती हैं, जिनका आकार लगभग एक से डेढ़ फुट तक होता है। अंत में इनके संचालन हेतु बीचोंबीच बांस की पतली छड़ियाँ लंबवत बाँधी जाती हैं।
प्रस्तुति के लिए 4×6 फीट का मंच तैयार किया जाता है। सामने सफेद कपड़ा बाँधा जाता है तथा बीच में “पनाती” नामक पत्थर का दीपक टांगा जाता है। इस प्रस्तुति में कम से कम तीन कलाकार शामिल होते हैं—

एक पुतली कलाकार, जो पुतलियों का संचालन करते हुए कथा सुनाता है,

एक “नायकी”, जो तबला वादन कर संवाद में सहयोग करता है,

तथा अन्य कलाकार, जो सामूहिक रूप से गीत प्रस्तुत करते हैं।

प्रयोग में लाया जाने वाला “वटा” नामक वाद्य एक उलटी पीतल की थाली होती है, जिस पर मोम की सहायता से सूखी टहनी लगाई जाती है और उँगलियों से हिलाकर संगीत उत्पन्न किया जाता है।
छाया पुतली प्रदर्शन गणेश वंदना से प्रारंभ होता है। सर्वप्रथम गणेश, मूषक, पुजारी एवं देवी सरस्वती की पुतलियों का प्रदर्शन किया जाता है। इसके पश्चात रामायण के विविध प्रसंगों पर आधारित कथाओं का मंचन होता है, जिसकी शुरुआत राम जन्म से होकर रावण वध तक पहुँचती है।

भौगोलिक वितरण

अन्य राज्यों की प्रमुख चर्मपुतली परंपराएँ—

तोगालु गोम्बेयाता — कर्नाटक

थोलपावई हरिशचंद्र — तमिलनाडु

थोलपावा महाविष्णु — केरल

थोलू बोमालता — आंध्र प्रदेश

मुख्य अतिथि प्रो. पराग दुबे ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत की लोक एवं जनजातीय कलाएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। उन्होंने मानव संग्रहालय द्वारा ऐसी विलुप्तप्राय कलाओं के संरक्षण एवं प्रदर्शन हेतु किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।
संग्रहालय के जनसंपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने बताया कि “माह का प्रादर्श” आगामी एक माह तक संग्रहालय की अंतरंग दीर्घा वीथि संकुल में प्रतिदिन दोपहर 12:00 बजे से शाम 7:30 बजे तक दर्शकों के अवलोकन हेतु प्रदर्शित रहेगा।
उद्घाटन कार्यक्रम में वीथि संकुल प्रभारी एन. सकमाचा सिंह, प्रशासनिक अधिकारी डॉ. पी. शंकर राव, डॉ. सोमा कीड़ो, डॉ. सूर्य कुमार पांडे, डॉ. सुदीपा रॉय, डॉ. पी. अनुराधा, राजीव जैन, राजेंद्र झरिया, ललित बागुल, राकेश गौतम, डॉ. प्रीतम चौधरी, डॉ. उमेश झारिया, सुनील अलपुरिया, दीपक चौधरी, धीर सिंह, तपस विश्वास सहित बड़ी संख्या में कर्मचारी, शोधार्थी, पीजीडीएम विद्यार्थी एवं कला प्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मोहनलाल द्वारा किया गया।

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