
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)08 मई। डॉ कृष्ण दयाल रचित कहानी और नाटक संग्रह “अनायास” की चौथी रचना थैला पैसा द्वंद्व काव्य एकांकी है।
थैला-पैसा द्वन्द्व (काव्य एकांकी)
थैला- निकलो घर से आ, तुम्हें बतलाता हूँ; तंग अंधेर नगरी वाले, आज तुम्हें बतलाता हूँ।
पैसा-बन्द करो मुँह अपना, क्यों नाहक ही फैलाते हो; शर्म करो अपनी हालत पर, क्यों बढ़कर बात बनाते हो ?
थैला- रे पगला तू क्या बोलेगा, छुपे-छुपे क्यों रहते हो; दशा देख ले अपनी तू, क्यों, ताले में बन्द बराबर रहते हो ?
पैसा- कहते तुमको लाज न लगती, क्यों सूई तुम्हें चुभायी जाती; दुर्बुद्धे ! क्या हरदम तुमको, नाथ-नाथ नहीं रखा जाता ।
थैला- रे मति भ्रम, उल्लू के पट्टे, क्या होश गँवाकर आये हो ? क्यों गला-गलाकर भट्टी में, तुम पिट-पिट नहीं आये हो ?
पैसा-बेशर्म ! ठोक कील लटकाये जाते, इसीलिए गर्दन में फाँसी, इतने पर भी होश नहीं; लगती तेरी कभी-कभी ।
थैला-चुप रह, छोड़ो शेखी अपनी, डर से पास तू आओगे; तुम्हें छुपाकर रखूँ नहीं तो, रात क्या दिन में लूटे जाओगे ।
पैसा- रे पेटू ! क्यों चुप न रहता,
मेरे पास ही आओगे,अगर न चाहूँ, पेट में अपने तू, एक दाना कभी ना पाओगे । रे अधम ! मैं राजा के मुकुट में शोभू इठलाकर तो मैं चलता हूँ, भरे हुए बाजार में ।
थैला- मूर्ख ! अपने मुँह से आप
क्यों अकल गई है तेरी मारी?
राज तुम्हें कर बंद थैली में रखता, बोलो, तुम भारी या मैं भारी ?
पैसा- निर्लज्ज ! मैं रहता हूँ राजकोष में, सौदागर सेठों के घर में; तुम्हारे जैसा दर-दर मारा, कभी न फिरता घर-घर में ।
थैला- अंधे ! कैसी है बकवास ये तेरी, राजा-रंक तो सब हैं मेरे; थैला का उपयोग नहीं बस, तुम्हें छुपाना, रहता हर सामान अंदर में मेरे ।
पैसा- थैला- मैं न रहूँ तो तुम रोओगे, तुम भी नहीं बचोगे; और बचेंगे, नहीं रोयेंगे ।
पैसा-चलो मुझे तुम सैर करा दो, आज मुझे बाजार दिखा दो;बंद तिजोरी में दम घुटता,थोड़ी हवा लगा दो। आज तेरा, मैं पेट भरूँगा, रख-रखने की नेकी को अब नहीं भूलूंगा; तेरी खातिर हाथों-हाथों, कोई ओर छोर अब नहीं छोडूंगा।
थैला-तुमको सदा बचायेंगे; अपने पेट के अंदर रखकर, और बना व्यापार नहीं तो श्रम से, तुम्हें पास फिर लायेंगे ।
थैला- जय पैसा की, जय थैला की, जय थैला की, जय पैसा की, जय दोनों की, कदम चाल की, रखे दोनों को, जो जैसा की ।

