
समस्तीपुर /बिहार (डाॅ परमानन्द लाभ)01 मई।एक बार भगवान बुद्ध वैशाली आए हुए थे और आम्रकानन में ठहरे थे। सुंदरी गणिका आम्रपाली उनके पास आकर निवेदन की- प्रभो! मैं आपके उपदेश से प्रभावित हूं और साधना में लगना चाहती हूं।
फिर?
प्रभो! परंतु रात-दिन नृत्य में लगे रहने के कारण अवकाश नहीं मिलता। कृपा कर आप मेरे लिए साधना कर दीजिए और बदले में जितना धन चाहें, ले लीजिए।
भगवान ने कहा- ठीक है। आम्रवन की इस कुटिया में प्रकाश का अभाव है। तुम ऐसा करो कि अपने महल में कुछ अधिक दीप जला देना जिससे मेरी यह कुटिया प्रकाशित हो जाए।
आम्रपाली हैरान हुई- भगवन! आप यह क्या कह रहे हैं? अपने महल में मैं दीप जलाऊं और प्रकाश आपकी कुटिया में पहुंचे, भला यह संभव है?
तथागत मुस्कुराए और बोले– तुम ठीक कहती हो आम्रपाली। इसीप्रकार मैं साधना का दीप अपने हृदय में जलाऊं तो उसका प्रकाश तुम्हारे अन्त: को उज्ज्वल नहीं कर सकता। इसलिए साधना का दीप तुम्हें अपने हृदय में स्वयं जलाना होगा।
बुद्ध की इस वाणी से प्रभावित हो आम्रपाली अपने वैभव, सुख-विलास का जीवन त्यागकर उनकी शिष्या बन गई।
दीक्षा देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा- ” आत्म दीपो भव!” तुम अपना प्रकाश स्वयं बनो।
यथार्थ है कि प्रत्येक प्राणी को अपना आध्यात्मिक रास्ता स्वयं तय करना है। ‘पंडित जी, एक लाख महादेव की पूजा मेरे लिए कर दें ‘ से काम चलने वाला नहीं है। सद्गुरु से सद्युक्ति जानकर अध्यात्म पथ पर अग्रसर होवें। इन्हीं कामनाओं के साथ बुद्ध पूर्णिमा के मौके पर उन्हें शत-शत नमन।

(लेखक डॉ परमानंद लाभ शिक्षाविद है, संपर्क: 7488204107)
