डाकघर
कुछ पहचान बताओ अपना, मैं चाहूँ तेरे घर आना; क्या है तेरा नाम बताना, क्या तेरा है ठौर ठिकाना ।
किस कुल में तुम जन्में हो, और काम कौन-सा करते हो; अग्रज-अनुज मिलाकर के, क्या साथ अभी तुम रहते हो।
कहाँ-कहाँ तुम जाते हो, और किससे नाता रखते हो; क्या खाते हो, क्या पाते हो, कैसे साथ निभाते हो ।
सिर पर जिसके ताज देश का, वही कुल है मेरे वंशज का;
मेरे रग में खून दौड़ता, संचार नाम है मेरे वंशज का।
डाक-तार हम दो भाई हैं, पर अनुज अलग अब रहता है; हम दोनों का महल एक है, मंत्रालय संचार जहाँ रहता है।
डाक नाम है मेरा समझो, तार अनुज है कहलाता; धनी-गरीब सबसे बस एक-सा, हरदम रहता साथ निभाता ।
बक्सा लाल एक खुला मुँह का, मेरे दरवाजे पर खड़ा मिलेगा; और पेट में ताला उसके, हरदम लगा मिलेगा ।
पेट भरूँ मैं पत्रों से, घर-घर जाता हूँ दिन-रात; पहुँचाता हूँ सबके पास, एक दूजे की बात ।
जिस घर में मैं ठहरूँ, उसको डाकघर से जानो तुम; मेरा घर तो तीन महला है, आकर भीतर देखो तुम ।
नीचे शाखा, बीच में उप, और कंगूरे पर है मुख्य; डाकपाल मालिक का नाम, शाखा, उप या हो वह मुख्य ।
शुरू-शुरू में संग्रह करता, फिर ढो-ढो कर के पहुँचाता; अंतिम जगह पहुँचने पर, फिर घर-घर में बँटवाता।
ये बाहर की बात बताये, पर भीतर कैसे रहते हो; दरवाजे पर जब रखा है बक्सा, फिर दिवारों में क्यों रखते हो।
बाहर वाला संग्रह करता, वो कहलाता लेटर बक्सा; वितरण करता सटा दिवाल जो, कहते उसे हैं पोस्ट का बक्सा ।
मैं आया हूँ दूर देहात से, क्या बाहर ही टहलावोगे; या अंदर घर अपने लाकर, सब कुछ मुझे बताओगे ।
आओ, चलकर देखो जनता हॉल, जहाँ जनता खड़ी मिलेगी; धीरे-धीरे बढ़ते जाना, एक अनुभूति बड़ी मिलेगी।
ये खिड़की है डाक टिकट का, आदि अन्त तक खुली मिलेगी; रंग-बिरंगे टिकटों का, हरदम भरमार मिलेगी।
दायें-बायें दो खिड़की जो, जिसको तुम हों देख रहे; पत्र-पार्सल पंजीकरण, होते हैं यहाँ तुम देख रहे।
कैसा है ये नाता रिस्ता, टिकटों से इन दोनों की; ऐसा लगता, कहीं प्रेमिका, बनकर बैठी दोनों की।
असल प्रेम जनता से इनका, पर यह करता इन दोनों से; जनता सुविधा भोगे मन भर, इसिलिए है बीच दोनों के।
एक दूजे की बात कहे थे, पर अचरज भरा काम पहुँचाता हूँ, यहाँ पाता हूँ;
चिट्ठी तो बातों का संवाद मात्र रहता है, फिर क्यों बातों का भी वजन हुआ करता है।
ग्राहक की हो बात भले ही, पर डाक वस्तु भर है इनका; अलग-अलग बस फीस भार पर, दूरी से नहीं मतलब इनका ।
बातों का क्या है वजन, ये बस पाने वाला जाने; ढ़ोने वाला भार बोझ का, बस इतना तक ही जाने।
पंजीकरण यहाँ होता है, केवल चिट्ठी पत्रों का; और कहीं हो कीमत वाली, बीमा होता पत्रों का।
और बगल की खिड़की पर, होता केवल पार्सल है; वस्तु अधिक पर बातें कम, रखता जो है, पार्सल है।
एक बात बतलाना हमको, कहीं पंद्रह, कहीं साठ कार्ड का, क्यों दाम लिया करते हो भार एक होने पर भी क्यों, भेदभाव किया करते हो।
जन साधारण राहत पायें, व्यापारी कुछ ज्यादा दे दें; यही राह समता समाज का, इसे नहीं भेद-भाव कहा करते।
हम अंधों की भी सेवा करते, निःशुल्क किया करते हैं; रखे हाथ जो नब्ज देश के ऊपर, उन समाचार पत्रों से, नाम मात्र लिया करते हैं।
करना हो व्यापार उधार का, फिर कैसे मदद करोगे; भी० पी० का सेवा हम देते, मिले माल तब पैसा दोगे।
एक मित्र को चाहूँ भेजना, मनिआर्डर से पैसा; मुझे बताओ करना जो है, और करूँ मनीऑर्डर वैसा ।
ये खिड़की है धनादेश का, जहाँ से मनिआर्डर है भेजा जाता; पैसा, शुल्क यहीं देना है, पाने वाले को नगद वहाँ है दिया जाता।
निकला एक बहाली ये है, माँग रहा है पोस्टआर्डर; ये बतलाओ कहाँ मिलेगा, मुझे दिला दो पोस्ट आर्डर ।
अगला खिड़की देख रहे जो, वहीं मिलेगा पोस्टल आर्डर; हर का लगता फीस अलग है, जितना लोगे पोस्टल आर्डर ।
वाह ! गजब का इश्तहार तेरा है, कहते हो घर-घर पहुँचाता; फिर ये वितरण खिड़की रखकर, तुम हो क्या करवाते ।
रहे न जिनका ठौर ठिकाना स्थावर, यहाँ मार्फत का पत्र है उनका आता; या घर जाने पर भेंट न होवे, उनका डाय यहाँ है बाँटा जाता।
खिड़की वितरण का एक टिकट, रखते हरदम है अपने साथ; उनका बस पहचान मिलाकर, दे देते हैं हाथों-हाथ ।
या आने का डाक, सूचना जब लाते हैं, और भरा अधिकार पत्र जब वे आते हैं; ये खिड़की बस मदद में उनकी, अपना जो हो डाक, यहीं से वे पाते हैं।
है त्वरित वितरण छोड़ दिया क्यों, तुमने एक लम्बे अरसे से; और जनता से तुम दूर हटे क्यों, लगातार कितने बरसों से।
हैं द्रुत गति का डाक दिया, नया खोजकर मैंने अब तो; कालबद्ध वितरण करता हूँ, इस सेवा को परखो अब तो।
कहते थे भार पर प्रभार लेता हूँ, फिर दूरी से क्यों इसको जोड़ा; क्यों प्रभार भार पर की नीति को धोखे से, चुपके-चुपके है तुमने छोड़ा।
बेहतर दाम पर बेहतर सेवा, क्या यह समाचार की नीति नहीं है।
जन उपयोगी में वाणिज्य का, थोड़ा घोल मिलाना, कोई गलत नहीं है।
तेज डाक पद्धति को, था एक बार तूने अपनाया; उसका क्या है हाल अभी तक, तूने नहीं बताया।
इस सेवा की पद्धति से मैं, मंडल को राजधानी से जुड़वाता; हर विकास के कामों को, ऊपर से नीचे तक जुड़वाता ।
सुना है अब तो बड़े व्यापार घरानों पर, है तूने नजर गड़ाया; कम्प्युटर, ई० मेल, भी० सेट को, डाकघर ने है अपनाया।
है खुशी हुई सब बातें जानकर, जितना तुमने मुझे बताया; मैं भी धन्य हुआ हूँ तुमसे, एक परिचर्चा तो करवाया।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की तेतालीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

