कीर्त्तन
आहो खुल गोइलन खुल गोइलन खुल गोइलन हो, साल भीतरे गोपाल कइसे, खुल गोइलन हो। टेक।
आहो जेल में जनमलन, आधी रात में जनमलन हो, त जेलवा के फाटक कइसे खुल गोइलन हो। टेक।
आहो यमुना लाँधे के बेरी, सुप में ढ़ोवइलन हो, त गोकुल में जाके कइसे खुल गोइलन हो। टेक।
आहो दही माखन खइलन, बाकी सिकहर गिरइलन हो, त माता यशोदा के आगे कइसे खुल गोइलन हो। टेक।
आहो साड़ी चोरी करके कदम गाँछी छुपलन हो, त राधा के आगे कइसे खुल गोइलन हो। टेक।
आहो बंसीया बजा के पिरितिया जगवलन हो, त द्वारिका में जाके कइसे भूल गोइलन होऽ । टेक ।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की चालीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

