
द्रोपदी !
वह एक थी, वे पाँच थे, बाप दादों के साथ थे।
वह खड़ी थी, बात बढ़ी थी, इज्जत की लड़ाई, अकेले ही लड़ी थी।
किसी की नियत बदली थी, उसकी धीरता आह में बदली थी।
चीर पर उसके, ज्यों ही हाथ बढ़ा, गुरू जनों का सिर था, धरती में गड़ा।
बेवस हो, जब हाथ से आँच छुटा, तत्काल ही था, सुदर्शन आ जुटा ।
नारी सिमटी रही, साड़ी बढ़ती गयी, उधर पापी के हाथ भी थकते गये।
वह हार थक कर बैठ गया, सन्नाटा सभा में पैठ गया।
सभा बीच थी मनहूसियत ही छायी, कुल श्री को तब, बात समझ में आयी।
जो हुआ परिणाम क्या अच्छा होगा, होगा पुत्रों का नाश, ये क्या अच्छा होगा।
आँख वालों की आँखें झुकी थी, अंधे राजा का तो सर ही झुका था।
प्रेम से बुलाया, द्रोपदी के दुःखों को सहलाये, सांत्वना दे शांत किया, इन्द्रप्रस्थ लौटाये।
काशः गन्धारी पुत्रों ने न छेड़ा होता, और पंचाली ने न लटों को खोला होता।
तब न विनाश के बादल ही छाते, और न भीषण महाभारत ही होता ।
कुल वधु की इज्जत को, अगर कोई इस तरह उधार पायेगा; तो निश्चय ही निज हाथों ही, कुल दीपक तक बुझा जायेगा।
प्रेम से बुलाया, द्रोपदी के दुःखों को सहलाये, सांत्वना दे शांत किया, इन्द्रप्रस्थ लौटाये।
काशः गन्धारी पुत्रों ने न छेड़ा होता, और पंचाली ने न लटों को खोला होता।
तब न विनाश के बादल ही छाते, और न भीषण महाभारत ही होता ।
कुल वधु की इज्जत को, अगर कोई इस तरह उधार पायेगा; तो निश्चय ही निज हाथों ही, कुल दीपक तक बुझा जायेगा।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की अड़तीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
