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पटना:साहित्य सम्मेलन में युगांतर लेकर आए पं छविनाथ पांडेय : डॉ अनिल सुलभ

अत्यंत विनम्र और विदुषी कवयित्री थीं गिरिजा वर्णवाल।

जयंती पर साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुआ कवयित्री-सम्मेलन, स्त्री-मन की खुली अनेक गाँठें।

RKTV NEWS/पटना(बिहार)14 अप्रैल। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के जीवन में एक महान युगांतर तब आया जब महान स्वतंत्रता सेनानी और हिन्दी-सेवी पं छविनाथ पाण्डेय सम्मेलन के प्रधानमंत्री के रूप में सम्मेलन से जुड़े। उन्हीं के कारण, सम्मेलन का मुख्यालय प्रदेश की राजधानी पटना में स्थापित हुआ, भूमि मिली और भवन का निर्माण हुआ और इस प्रकार सम्मेलन के जीवन में स्थायित्व की स्थापना हुई। यदि वो न होते तो देश के अन्य प्रांतीय साहित्य सम्मेलनों की भाँति बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अस्तित्व भी दशकों पूर्व समाप्त हो गया होता।
यह बातें बुधवार को सम्मेलन सभागार में आयोजित जयंती समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, सम्मेलन को अमर बनाने में जिन साहित्यकारों ने अपना सब कुछ न्योछावर किया, उनमें छविनाथ जी अग्रगण्य थे। वे हिन्दी और अंग्रेज़ी के महान विद्वान, पत्रकारिता के भी आदर्श और मुद्रण-कला के विशेषज्ञ थे। पांडेय जी का ऋषि-तुल्य तपस्वी-जीवन हमें सदा प्रेरणा देता है।
विदुषी कवयित्री गिरिजा वर्णवाल को स्मरण करते हुए डा सुलभ ने कहा कि काशी विश्व विद्यालय में आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और डा नामवर सिंह जैसे महान साहित्याकारों की शिष्या रहीं गिरिजा जी एक विदुषी लेखिका ही नहीं एक आदर्श स्त्री भी थीं। उन्होंने एक कुशल गृहिणी की तरह अपने पति स्मृति-शेष साहित्यकार नृपेंद्र नाथ गुप्त के साहित्यिक व्यक्तित्व के उन्नयन में अमूल्य योगदान दिया। साहित्य और साहित्याकारों के प्रति उनका अनुराग भी अनुकरणीय था। उनकी रचनाओं में उनकी प्रतिभा और विद्वता की स्पष्ट झलक मिलती है। उनकी विनम्रता और उनका आंतरिक सौंदर्य, उनके विचारों, व्यवहार और रचनाओं में अभिव्यक्त हुआ है। उनके व्याख्यान भी अत्यंत प्रभावशाली होते थे। उनके चेहरे पर सदा एक स्निग्ध मुस्कान खिलती रहती थी, जो उन्हें विशिष्ट बनाती थी।
सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा शंकर प्रसाद, विवेक नृपेंद्रनाथ गुप्त, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, विभा रानी श्रीवास्तव, ई अशोक कुमार, ई बाँके बिहारी साव, इंदु भूषण सहाय ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।
जयंती-समारोह के पश्चात सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा की अध्यक्षता में एक भव्य और चिर-स्मरणीय कवयित्री-सम्मेलन भी आयोजित हुआ, जिसमें स्त्री-मन की अनेक गाँठें खुलती हुई दिखायी दीं। कवयित्रियों ने अपनी हृदय-स्पर्शी काव्य-रचनाओं में परत-दर-परत अपने मन को खोला और मधुर-रस की फुहारों से सम्मेलन के कोने-कोने को स्पंदित कर दिया। काव्य-पाठ करने वाली कवयित्रियों में डा पूनम आनन्द,डा ऋचा वर्मा, डा पुष्पा जमुआर, गार्गी राय, डा पूनम सिन्हा श्रेयसी, डा मीना कुमारी परिहार ‘मान्या’, डा पूनम देवा, अभिलाषा कुमारी,सागरिका राय, इंदु उपाध्याय, मधु रानी लाल, मीरा श्रीवास्तव, सीमा रानी, प्रेमलता सिंह, विनीता शर्मा, डा रेणु मिश्रा, डा प्रतिभा रानी,प्रियम्वदा मिश्र, रंजनाकुमारी ‘कविता’, एकता शाही, नमिता लोहानी, राजप्रिया रानी आदि सम्मिलित थीं। जयंती-समारोह का संचालन कुमार अनुपम ने तथा कवयित्री-सम्मेलन का संचालन डा शालिनी पाण्डेय ने किया।
इस अवसर पर, सम्मेलन के प्रबंधमंत्री कृष्ण रंजन सिंह, भवन-अभिरक्षक प्रवीर कुमार पंकज, गोपाल प्रसाद बरनवाल, सियाराम पाण्डेय, राज किशोर चौधरी, नरेश कुमार, सतीश कुमार, रंजना कुमारी, भास्कर त्रिपाठी, महेंद्र सिंह, नन्दन कुमार मीत आदि प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित थे।

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