
निदान!
समझे आज क्यों, दुर्लभ बनता जाये जीना; बरबस क्यों माथे पर, हरदम छूटता रहे पसीना ।
पलना से अर्थी तक कौन यह, मेरा सुख छीनता जाता, सुख का सुरज कब निकलेगा, मैं दिन गिनता जाता।
और जुझता रहता नित दिन, दबता जाता भार से; मुझे बचाओ अब तो बस, मंहगाई की मार से।
ऊपर से नीचे तक आती, भ्रष्टाचार की धार से; खूनी खंजर लेकर चलते, उनके ही बस वार से।
मंदिर-मस्जिद तक जो घसीटे, वैसे ही संसार से; पैसा लेकर दुल्हा बिकता, वैसे भी तो व्यापार से ।
बायें अगुँठा पड़े बढ़ाना, उस शिक्षा के सार से; पढ़-लिखकर जो ठोकर खाये, वैसे भी बेकार से।
दवा बिना जिस, बच्चे मरते, वैसे कालाजार से; धरे हाथ पर हाथ खड़े, रह जाने के इंतजार से ।
तो धन और धरती मिलकर बाँटें, भाई-चारा मिलकर बाँटे; मेहनत को मस्तक पर साटे, लाभ मधु का मिलकर चाटें।
लालच लोभ को घर से छाटें, हर को बस हरिहर ही जाने; सबको भाई, सबको बहना, सबको ही बस अपना जाने ।
आओ पैसा का पैगाम बदल दें, पूंजी, श्रम का भेद मिटा दें; एक दूजे पर जान लगा दें, धरती पर चंदा को ला दें।
मेहनत कश को सर पर ला दें, दुर्लभ को आसान बना दें; चलो चले आसान बना दें, दुर्लभ को आसान बना दें।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की तेइसवी रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
