
खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 18 फरवरी। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराएं जब राष्ट्रीय राजधानी के मंच पर उतरीं, तो हर कोई मंत्रमुग्ध रह गया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित ‘भारत रंग महोत्सव’ में 15 फरवरी की शाम बेहद खास रही, जहां युवा रंगकर्मी चंद्रहास बघेल और उनकी टीम ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। दिल्ली के ओपन एयर थिएटर में चंद्रहास बघेल द्वारा निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘लोक नाट्य नाचा फैशन शो’ का मंचन हुआ, जिसने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान दिलाई।
इस प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक नाचा शैली को आधुनिक कलेवर के साथ इतने प्रभावशाली ढंग से पिरोया गया था कि दर्शकों को छत्तीसगढ़ की मिट्टी की सोंधी खुशबू और ग्रामीण जीवन की जीवंतता का अनुभव हुआ। चंद्रहास बघेल ने अपने सशक्त अभिनय और कुशल निर्देशन के जरिए दिल्ली के दर्शकों को एक ऐसी दुनिया की सैर कराई, जहां लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक वेशभूषा का अनूठा संगम देखने को मिला। परंपरा और आधुनिकता के इस मेल ने न केवल दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित किया, बल्कि राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ के लोक जीवन की गहराई को भी बखूबी उजागर किया। नाटक की प्रस्तुति के दौरान दर्शकों ने तालियों की गूंज के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। चंद्रहास बघेल के निर्देशन में कलाकारों ने अपने सशक्त अभिनय से छत्तीसगढ़ की संस्कृति की आत्मा को मंच पर जीवंत कर दिया। डॉ. योगेंद्र चौबे के मार्गदर्शन और डॉ. परमानंद पांडेय के संगीत संयोजन ने दर्शकों को अपनी जगह से हिलने तक नहीं दिया। यह प्रस्तुति केवल एक नाटक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज बनकर सामने आई।
चंद्रहास बघेल, जो कि बाइसन कला फाउंडेशन के माध्यम से निरंतर लोक कला और रंगमंच के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, ने इस मंच के जरिए यह सिद्ध कर दिया कि गांव और लोक परंपरा की जड़ें कितनी मजबूत और समृद्ध हैं। उनकी इस उपलब्धि से न केवल उनके संस्थान बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश में गर्व और उत्साह का माहौल है।
भारत रंग महोत्सव जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के मंच पर छत्तीसगढ़ की लोक कला की प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर अपनी अलग छाप छोड़ने में सक्षम है। चंद्रहास बघेल की यह सफलता आने वाले युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
कलाकारों के अभिनय ने जीता दर्शकों का दिल
इस गौरवशाली उत्सव में कलाकारों ने अपनी बेहतरीन कला के माध्यम से न केवल ग्रामीण परिवेश को मंच पर उतारा, बल्कि लोक कथाओं के माध्यम से नई ऊंचाइयों को भी छुआ। नाटक के केंद्र में चंद्रहास बघेल रहे, जिन्होंने ‘जोकर’ की मुख्य भूमिका में जान फूंक दी। वहीं, परमेश्वर साहू ने ‘छोटा जोकर’ के रूप में अपने अद्भुत प्रदर्शन से खूब तालियां बटोरीं। ग्रामीण परिवेश और प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाते हुए विकास गायकवाड़ ‘सरपंच’ और योगेश यादव ‘कोतवाल’ के सशक्त किरदारों में नजर आए। नाटक के अन्य महत्वपूर्ण पात्रों में प्रमोद साहू (जनाना परी), हर्ष गिरी भट्ट (बाप) और खगेश पैकरा (बेटा/नवा जोकर) का अभिनय सराहनीय रहा। इनके साथ ही रोहन जंघेल और निखिल कुमार ने ‘ग्रामीण’ की भूमिका को सहजता से निभाया। इस आयोजन में महिला कलाकारों ने भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें बिंदु नायर (परेमीन), खुशबू भूमिज (भूरी), सोनल बागड़े (ठेसनीन), भारती जंघेल (बुधिया) और कुशल सुधाकर (नजरिया परी) प्रमुख रहीं।
नेपथ्य की मेहनत ने फूंके नाटक में प्राण
किसी भी नाटक की सफलता मंच के पीछे की टीम पर निर्भर करती है। डॉ. योगेंद्र चौबे के कुशल मार्गदर्शन में सागर गुप्ता ने शानदार प्रकाश अभिकल्पना की। नाटक की लय को बनाए रखने में संगीत टोली का बड़ा योगदान रहा। हारमोनियम पर परमानंद पांडेय, ढोलक पर हेमंत, बैंजो पर मुजीत निषाद और तबला पर वेद प्रकाश रावटे की जुगलबंदी ने समां बांध दिया। तकनीकी टीम में वेशभूषा की जिम्मेदारी सोनल बागड़े, कुशल सुधाकर और दिव्या राई ने संभाली, जबकि रूपसज्जा (Make-up) का कार्य दिशा चतुर्वेदी और खुशबू भूमिज द्वारा किया गया। वहीं, दृश्यबंध (Set Design) का कुशल संपादन योगेश यादव, खगेश पैकरा और पप्पू प्रकाश ने किया है।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं निर्देशक चंद्रहास बघेल
इस प्रस्तुति के पीछे छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले (ग्राम गिरोला, अभनपुर) के प्रतिभावान युवा निर्देशक चंद्रहास बघेल का विजन है। 25 मई 1996 को जन्मे चंद्रहास आज के दौर के एक सक्रिय रंग अभिनेता, निर्देशक और लेखक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से रंगमंच में स्नातक (BPA) और स्नातकोत्तर (MPA) की शिक्षा प्राप्त की है। प्रख्यात रंग निर्देशक प्रो. देवेन्द्र राज अंकुर के मार्गदर्शन में प्रशिक्षित चंद्रहास को भारत सरकार (CCRT) द्वारा अभिनय हेतु राष्ट्रीय छात्रवृत्ति भी प्रदान की गई है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोकनाट्यों की बारीकियों पर गहरा शोध किया है, जिसका प्रभाव उनके निर्देशन में स्पष्ट झलकता है। उनके करियर ग्राफ में भारत रंग महोत्सव, काला घोड़ा और कालिदास नाट्य महोत्सव जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मंचों पर भागीदारी शामिल है। ‘पहटिया’, ‘बाबा पाखंडी’, ‘विन्सेन्ट: अ फ्लैशबैक’ और ‘भरथरी: एक वैराग्य गाथा’ जैसे सफल नाटकों में अभिनय कर चुके बघेल ने ‘नाचा फैशन शो’ और ‘द इंडियन रॉबिन हुड’ जैसी प्रस्तुतियों के जरिए लोक कला को आधुनिक कलेवर दिया है। रंगमंच के साथ-साथ वे क्षेत्रीय सिनेमा में भी सक्रिय हैं और फिल्म ‘मांग सजा दे सजना’ में एक खलनायक के रूप में अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवा चुके हैं। उनका मूल उद्देश्य आधुनिक रंगमंच के माध्यम से समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और लोक विरासत से जोड़ना है।
