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काहें का सच!

रचनाकार:अजय कुमार उर्फ
अजय गुप्ता “अज्ञानी”(बाबू बाजार,आरा,भोजपुर, बिहार)

काहें का सच!

काहे का सच,
किसका प्यारा।
रूकावटें-रूकावटें!
खोई खोई अवसर।
चकाचौंध बेमानी,
पतझर सच।
झूठा सबल,
निर्बल सच।
निर्जन निर्झर सच,
लहलहाती बेमानी।
बेमानी रौशन,
अंधियारा सच।
बेमानी घर मेला,
दुतकारी गई सच,
घर अजिरा,
समाज का प्यारा।
सजल आंखों से
मिलता हैं सच।
छुट गये कोसों,
सच पुजारी,
बस कहना प्यारी,
सच है मस्त।
बस गुजरती है ,
कांटों पे जिंदगी।
जन फासले रखते,
सच में सच।
कौन सच?
कैसा सच?
कहां सच?
सच के पांव बेड़ी,
झूठ चुमा
सच में अर्स।
पथिक बतायेगा,
सच का सच।
झूठा-झूठा,
झूठा है सच।
बेमानी रहती,
हरदम मस्त।
हरदम——

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