केंद्र सरकार की कॉरपोरेट परस्त नीतियों से पर्यावरण विनाश के रास्ते पर बढ़ रहा आगे: सुदामा प्रसाद

पर्यावरण बचाओ भारत बचाओ के संदेश के साथ निकाली गई जागरूकता यात्रा।

अरावली बचाओ! हिमालय बचाओ! ग्रेट निकोबार बचाओ! हसदेव अरण्य बचाओ!
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)28 दिसंबर।जल – जंगल – जमीन – पर्यावरण बचाने को लेकर भाकपा माले, आइसा और RYA के द्वारा आज भाकपा माले जिला कार्यालय श्री टोला से मार्च निकाल कर पूर्वी गुमटी, नवादा होते हुए रेलवे परिसर पहुंच कर सभा में तब्दील हुआ।सभा का संचालन छात्र संगठन आइसा भोजपुर जिला सहसचिव रौशन कुशवाहा ने किया।
सभा को संबोधित करते हुए भाकपा माले केंद्रीय कमेटी सदस्य सह आरा लोकसभा सांसद सुदामा प्रसाद ने कहा कि प्रकृति और हमारी जल-जंगल-ज़मीन को बचाने के लिए कोई प्लान-बी नहीं है. हमारे पास एक ही दुनियां है. दिल्ली की दमघोंटू हवा से लेकर छत्तीसगढ़ और ग्रेट निकोबार के उजड़ते जंगलों तक, और हिमालय में लगातार सामने आती आपदाओं तक— हम अपने भविष्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के खिलाफ़ मोदी सरकार की विनाशकारी नीतियों के गवाह हैं.
एक तरफ़ मोदी सरकार झूठ पर झूठ बोल रही है, और दूसरी तरफ़ उसके कारपोरेट मित्र —सरकार की तथाकथित ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ नीति के पूरे संरक्षण में— हमारी साँसों की हवा, पीने का पानी, जंगल, पहाड़ और प्रकृति को बेरहमी से तबाह कर रहे हैं. जब पूरी दुनिया जलवायु संकट और उसके गरीब-कमज़ोर लोगों पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित है, तब यह सरकार बेशर्मी से पर्यावरण विनाश के रास्ते पर आगे बढ़ रही है.
सभा को संबोधित करते हुए भाकपा माले केंद्रीय कमेटी सदस्य राजू यादव ने कहा कि मोदी सरकार ने दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला, अरावली, की परिभाषा को मनमाने और छलपूर्ण तरीके से बदल दिया है ताकि इन्हें खनन के लिए खोल दिया जा सके. अब वे इस विनाश को ‘टिकाऊ खनन’ के नाम पर जनता को बेचने की कोशिश कर रहे हैं. इस नई परिभाषा के बाद अरावली का नब्बे फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा खनन माफ़िया के ख़तरे में आ गया है.
लगभग 670 किलोमीटर में फैली अरावली, दिल्ली से शुरू होकर दक्षिणी हरियाणा और राजस्थान से गुजरती हुई अहमदाबाद तक जाती है. ये पहाड़ियाँ पूरे इलाके के लिए ‘फेफड़े’ के समान हैं. अरावली के बिना दिल्ली और आसपास के इलाके भीषण मरुस्थलीकरण का सामना कर सकते हैं. सदियों से ये पहाड़ियाँ थार रेगिस्तान की धूल और लू के सामने प्राकृतिक ढाल रही हैं. इनकी चट्टानी धारियाँ और ढलान रेगिस्तानी हवाओं की रफ़्तार को धीमा करती हैं, मिट्टी को थामे रखती हैं, धूल को रोकती हैं, नमी को संतुलित करती हैं और बारिश के पानी को ज़मीन के भीतर जलस्त्रोतों तक पहुँचने देती हैं. ये प्रकृति के अपने जल और जलवायु नियामक हैं, लेकिन आज इन्हें हमेशा के लिए खोने का ख़तरा है.
यह खतरा सिर्फ़ अरावली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में फैल रही लूट, दोहन और पर्यावरणीय विनाश की बड़ेी साज़िश का हिस्सा है.
सभा को संबोधित करते हुए इंकलाबी नौजवान सभा के राज्य सचिव व अगियांव पूर्व विधायक शिवप्रकाश रंजन ने कहा कि उत्तराखंड में मोदी सरकार ने 900 किलोमीटर की चारधाम सड़क परियोजना को जानबूझकर 100 किलोमीटर से कम के 53 हिस्सों में बाँट दिया, ताकि बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए ज़रूरी समग्र पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) से बचा जा सके. इसके साथ ही नाज़ुक हिमालयी क्षेत्र में अवैज्ञानिक और लापरवाह निर्माण को खुली छूट दी गई.
आज इसके जानलेवा नतीजे सामने हैं—भूस्खलन, बाढ़ और जोशीमठ में ज़मीन धँसने की त्रासदी. ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, नदियाँ उफान पर हैं, और स्थानीय समुदाय हर साल जान-माल और रोज़ी-रोटी खो रहे हैं.
वहीं सभा को संबोधित करते हुए इंसाफ मंच राज्य सचिव व आरा विधानसभा पूर्व प्रत्याशी कयामुद्दीन अंसारी ने कहा कि ग्रेट निकोबार स्वैप यानी कम्पेन्सेटरी अफ़ॉरेस्टेशन के नाम पर, सरकार ने मेगा विकास परियोजना के लिए ग्रेट निकोबार द्वीप के 130 वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक उष्णकटिबंधीय जंगल को नष्ट कर दिया. इसके तथाकथित मुआवज़े के तौर पर हरियाणा की अरावली में पौधारोपण दिखाया गया—जो निकोबार से करीब 2,400 किलोमीटर दूर है और पूरी तरह अलग पारिस्थितिकी और जलवायु में स्थित है. इस खुले पर्यावरणीय धोखाधड़ी को अब ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ के नाम से पेश किया जा रहा है.
छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य, भारत के सबसे घने जंगलों में से एक, मोदी सरकार के कारपोरेट मित्र अडानी के हितों के लिए निशाने पर है. लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं, हज़ारों एकड़ जंगल मिटाए जा रहे हैं, और यह सब पेसा क़ानून, वन संरक्षण अधिनियम और भूमि अधिग्रहण क़ानून 2013 का उल्लंघन करते हुए हो रहा है. बड़ी संख्या में आदिवासी कारपोरेट बुलडोज़रों के सामने ज़बरन बेदख़ली और विस्थापन का सामना कर रहे हैं.
क्लीन यमुना और क्लीन गंगा जैसे प्रोजेक्ट्स पहले ही इस सरकार की भ्रष्टाचार और संवेदनाहीनता को उजागर कर चुके हैं. हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद हमारी नदियाँ पहले से अधिक प्रदूषित हैं.
आज हमारे प्राकृतिक संसाधनों को उन्हीं मुनाफ़ाख़ोर कारपोरेट्स के हवाले किया जा रहा है, जो दान के नाम पर सत्ताधारी पार्टी को फ़ंड देते हैं. सरकार तथ्यों को छुपाती है, पर्यावरण क़ानूनों में छेड़छाड़ करती है, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे संस्थानों को कमजोर करती है, और आदिवासियों व मछुआरों की आजीविका पर हमला करती है. इसी कारपोरेट लूट के तहत झारखंड के सारंडा, हजारीबाग और संथाल परगना के जंगलों का और धनबाद के आसपास कोयला खनन इलाकों का पर्यावरणीय विनाश जारी है.
छात्र संगठन आइसा भोजपुर जिला सचिव विकाश कुमार ने कहा कि
सरकार हमारी शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, भोजन, काम और सूचना के अधिकार छीन रही है, और लोकतंत्र, संविधान और मतदान के अधिकार पर हमला कर रही है.
अब हमारी हवा, पानी, जंगल, समुद्र और आसमान भी सरकार के निशाने पर हैं. हमें एकजुट होकर इस विनाश की लहर का विरोध करना होगा.
हम सभी देशभक्त नागरिकों और संगठनों से अपील करते हैं कि आप अपनी आवाज़ उठाएँ और अरावली, हिमालय, ग्रेट निकोबार और हसदेव अरण्य की रक्षा करें.
पर्यावरण बचाओ मार्च में भाकपा माले राज्य कमेटी सदस्य व आरा नगर सचिव, सुधीर सिंह, आरा मुफ्सिल सचिव विजय ओझा , आइसा राज्य सचिव कॉ शबीर कुमार, RYA जिला अध्यक्ष निरंजन केसरी, कार्यालय सचिव दिलराज प्रीतम, आइसा जिला सहसचिव जयशंकर प्रसाद, उपाध्याय सुमित कुमार, साहिल अरोड़ा, इंसाफ मंच जिला सचिव गांधी जी, अखिलेश गुप्ता, हरिनारायण गुप्ता, बब्लू गुप्ता,अप्पू यादव, परमात्मा यादव, बालमुकुंद चौधरी, दीपक कुमार, अहमद जी, धनंजय कुमार, रितेश पासवान, हरिनाथ राम सहित दर्जनों भाकपा माले, आइसा और RYA कार्यकर्ता शामिल थे।

