
आरा /भोजपुर (अतुल प्रकाश)06 दिसंबर।सही मायने में कहा जाए तो रामदास राही भिखारी ठाकुर के साहित्यिक विरासत के वाहक थे। उनके संस्मरणों और स्मृतियों के आधार पर कई लेखकों और साहित्यकारों ने भिखारी ठाकुर पर अपनी रचनाएं लिखीं। चाहे संजीव का भिखारी ठाकुर पर चर्चित उपन्यास “सूत्रधार” हो या नागेंद्र सिंह द्वारा संपादित तथा राजभाषा परिषद् से प्रकाशित “भिखारी ठाकुर ग्रंथावली” हो सब में रामदास राही ने भिखारी ठाकुर के साहित्यिक अवदान के विषय में सामग्री उपलब्ध कराई। रामदास राही इस पूरे प्रयास में खुद को कहीं भी नायकत्व का लबादा नहीं पहना बस वे समर्पित भाव से भिखारी ठाकुर के कृतित्व और व्यक्तित्व का बखान आजीवन करते रहे। वे कभी संजीव के लिए भिखारी ठाकुर पर लिखे उपन्यास ‘सूत्रधार’ के सूत्रधार बन जाते हैं, तो कभी भिखारी ठाकुर के नाम पर आश्रम बनाने में लग जाते हैं। कई किताबें भी उन्होंने भिखारी ठाकुर पर लिखी हैं। रामदास राही लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम के मंत्री एवं संस्थापक थे। वे पिछले 50 वर्षों से भिखारी ठाकुर के साहित्य एवं स्मृतियों को सहेजने एवं प्रकाशित करवाने में लगे हुए थे। रामदास राही ने भिखारी ठाकुर को बहुत करीब से देखा था उनके साहित्य एवं स्मृतियों को अपने जीवन और आचरण में आत्मसात किए था।
अक्सर रामदास राही अपने परिचय में कहा करते थे कि “मैं रामदास राही, संस्थापक एवं मंत्री, लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम कुतुबपुर सारण बिहार।”
रामदास राही का जन्म 4 मार्च, 1942 ई को ग्राम सेमरिया पोस्ट बड़हरा भोजपुर बिहार में हुआ था। वे बहुत सामान्य परिवार से थे। उनके पिताजी राजगृही ठाकुर बंगाल पुलिस में थे। परिवार में शिक्षा का खास माहौल नहीं था, न ही साहित्य की कोई खास विरासत थी। उनकी शिक्षा किसी विश्वविद्यालय में भी नहीं हुई।
वे अक्सर बताते थे कि *”गरीबी में रहते हुए भी मैंने साहित्यकारों के सानिध्य में हिंदी, संस्कृत और भोजपुरी के कई पुस्तकों का अध्ययन किया। मुझे यात्राएं करना बहुत पसंद है इसीलिए मैंने अपने नाम में राही लगा लिया। ज्यादातर यात्रा मैंने साहित्य के लिए की है। उत्तर भारत के हिंदी और भोजपुरी के नामचीन साहित्यकारों एवं संपादकों से मिलना हुआ है। उसके साथ-साथ मेरी लेखनी भी चलती रही। भिखारी ठाकुर मेरे गुरुदेव हैं। मैं उनके साहित्य का बचपन से ही अध्ययन करता रहा हूँ। ”
रामदास राही ने न केवल दूसरों को भिखारी ठाकुर पर लिखने के लिए सामग्री और प्रेरणा दी और स्वयं भी भी भिखारी ठाकुर पर अपनी समीक्षात्मक पुस्तक प्रकाशित करवाई। मेरी जानकारी में रामदास रही ने जिन पुस्तकों का प्रकाशन करवाया है उनमें
1. भाई विरोध समीक्षा पुस्तक
2. भिखारी ठाकुर के भक्ति भावना में लोकमंगल के आयाम
3. भिखारी ठाकुर कुतुबपुर से कुतुबपुर तक
4. भिखारी ठाकुर स्मृतियों के फलक पर लिखी।
इसके अलावा कुछ मनीषी साहित्यकारों के सहयोग से भिखारी ठाकुर ग्रंथावली (भाग 1 और भाग 2) एवं भिखारी ठाकुर रचनावली के लिए साहित्य का संग्रह किया एवं उसे प्रकाशित कराया। इसके अतिरिक्त उन्होंने “बाबू रघुवंश नारायण पर “जिंनगी जिसे जिया, व्यक्तित्व एवं कृतित्व” का प्रकाशन भी कराया है। उनके मित्र एवं सहयोगी रहे कर्मयोगी आचार्य द्वारिका सिंह पर भी एक पुस्तक है। हिंदी एवं भोजपुरी के कई पत्रिकाओं में रामदास रही के आलेख प्रकाशित हुए हैं। आकाशवाणी पटना से से भी उनके कई वक्तव्य प्रसारित हुए हैं। देशभर से कई शोधार्थी एवं साहित्यकार भिखारी ठाकुर से संबंधित जानकारी लेने के लिए उनके पास पास आते रहते थे। भिखारी ठाकुर पर बात करने के लिए उन्होंने कभी भी किसी को मना नहीं किया। भिखारी ठाकुर ग्रंथावली प्रकाशित होने के बाद सन 1980 में बिहार सरकार द्वारा उनको सम्मानित किया गया था। एक सम्मान भिखारी ठाकुर स्कूल ऑफ ड्रामा पटना द्वारा ” भिखारी ठाकुर धरोहर सम्मान” भी मिला था। इसके अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक आयोजनों एवं संस्थान द्वारा उनको अनेक प्रकार के सम्मान एवं पुरस्कार मिलते रहे हैं।
