
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)07 नवंबर। लोकतंत्र के इस महापर्व चुनाव को लोग अपने-अपने नजरिया से देखते हैं। यह वोट की ताकत, प्रत्याशी के प्रति आस्था और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के प्रति अंतरात्मा की आवाज है। वैसे तो बाहर से केवल अमिट स्याही है लेकिन पांच साल ही नहीं ,जीवन भर दिये गये मत को स्मरण कराते रहती है।क्या हमने जो किया वह सही था?।यह निशानी सिर्फ वोट की नहीं, बल्कि लोकतंत्र से जुड़ने की कहानी है।
जब हम उंगली पर स्याही लगवाते हैं, तो वह केवल मतदान का प्रमाण नहीं होता — वह इस बात का प्रतीक होता है कि हमें अपने देश, अपने संविधान और अपने अधिकारों पर गर्व है।
लोकतंत्र की असली ताकत जनता के हाथों में होती है, और यह ताकत तभी अर्थपूर्ण बनती है जब हम उसका उपयोग करते हैं। हर एक वोट देश की दिशा तय करता है, हर एक वोट आने वाले कल की तस्वीर बनाता है। इसलिए यह स्याही की रेखा केवल चुनाव की निशानी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, जागरूकता और जनशक्ति का प्रतीक है।
आज जब कोई कहता है कि “एक वोट से क्या फर्क पड़ता है”, तो याद रखिए — इतिहास में कई बार एक वोट ने सरकारें बदली हैं, नीतियाँ तय की हैं और भविष्य लिखा है।
इसलिए, यह स्याही लगी उंगली हमारे लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत पहचान है — यह बताती है कि हम न केवल देश के नागरिक हैं, बल्कि उसकी आत्मा से जुड़े हुए हैं।
