
RKTV NEWS/अतुल प्रकाश (अधिवक्ता सह सभापति, जनहित परिवार प्रतिनिधि सभा)03 नवंबर।चुनाव का समय है अक्सर चौक चौराहे और चौपालों पर जातिवादी प्रत्याशी और जातिवाद समीकरण की चर्चा आम होती है कि कौन किसका वोट काटता है और कौन कितने मतों से विजई होगा या हारेगा या किस जाति के उम्मीदवार का प्रभाव पड़ेगा या अमुक जाति का प्रभाव नहीं पड़ेगा। ऐसी तमाम चर्चा को बढाने के सबसे बड़े दोषी पत्रकार और मीडिया कर्मी होते हैं जो आंकड़ों के जरिए जातीय समीकरण पर चर्चा करते हैं। बिहार में या पूरे देश में जातिवादी राजनीति एक बड़ा मुद्दा है परंतु बिहार में इस मुद्दे का प्रचार प्रसार बहुत अधिक होता है। बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा जातिवादी नारा “भूरा बाल साफ करो” को फैलाने में या यूं कहे की बार-बार फैलाने में मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसे जातिवादी का प्रचार प्रसार मीडिया के माध्यम से ही होता है इससे समाज में जातिवादी गोलबंदी बढ़ती है और विद्वेष बढ़ता है। आजकल तो जातीय आंकड़ों के आधार पर और राजनीतिक दल के रुझान के आधार पर नेताओं का और राजनीतिक दलों के चुनाव सर्वे का विश्लेषण किया जाता है जो समाज में जातिवादी कटुता फैलता है।
जातिवाद फैलाने के सबसे बड़े दोषी तथाकथित पत्रकार हैं जो जाति के आधार पर वोट की गणना करते हैं, यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता को कम करता है।
पत्रकारिता का उद्देश्य सच्चाई को उजागर करना और समाज को जागरूक करना होना चाहिए, न कि जाति या धर्म के आधार पर विभाजन को बढ़ावा देना।
आप मेरी बात पर सहमत हों या ना हों चुनाव के समय में जातिवादी प्रत्याशी और जातिवाद समीकरण की चर्चा आम होती है, जो समाज में विभाजन को बढ़ावा देती है। पत्रकार और मीडिया कर्मी अक्सर आंकड़ों के जरिए जातीय समीकरण पर चर्चा करते हैं, जो जातिवाद को बढ़ावा देता है।
पत्रकारिता का उद्देश्य सच्चाई को उजागर करना और समाज को जागरूक करना होना चाहिए, न कि जाति या धर्म के आधार पर विभाजन को बढ़ावा देना। हमें पत्रकारिता में उच्च मानकों को बनाए रखना चाहिए और जातिवाद को बढ़ावा देने वाले पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।
आइए हम समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए काम करें और जातिवाद को बढ़ावा देने वाले तत्वों का विरोध करें।
