
भोपाल/ मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद) 30 अक्टूबर।भोपाल वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर डॉ.विनोद सक्सेना गुलज़ार एवं कवि गोष्ठी सम्पन्न गजल संग्रह का लोकार्पण उनके निवास ‘आशियाना ‘ न्यू मिनल रेसीडेंसी आवास पर सादे किंतु गरिमामय आयोजन में सम्पन्न हुआ |
इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो .राजपाल सिंह और अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी उपस्थित थे। इस गजल संग्रह पर मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए समीक्षक सुरेश पटवा ने कहा कि विनोद गुलज़ार जी की ग़ज़लें प्रेम में पीड़ा और विछोह से उपजी दर्द भरी ग़ज़लें हैं जो उन्होंने अपनी पत्नी के निधन के पश्चात उनकी यादों में डूबकर लिखी हैं।’ इस अवसर पर मुख्य अतिथि वक्ता प्रो.राजपाल सिंह ने इन ग़ज़लों को आम आदमी के जीवन की गहन अनुभूतियों की गजल बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी ने इन ग़ज़लों को प्रेम पीड़ा और स्मृतियों की त्रिवेणी बताया तथा लोकार्पित संग्रह से कुछ ग़ज़लों के चुनिंदा शेरों के साथ अपनी बात रखते हुए गजलकार को बधाई दी।इस अवसर पर गजलकार डॉ .विनोद सक्सेना गुलज़ार ने अपने गजल संग्रह की कुछ चुनिंदा ग़ज़लों का पाठ भी किया ,उनकी गज़ल का एक शेर -‘ हाथ में लेकर हम हाथ प्यार से चलते रहेंगे ,आंधियों में भी इसी रफ्तार से चलते रहेंगे। इस अवसर पर घनश्याम मैथिल अमृत के संचालन में एक गीत गोष्ठी आयोजित की गई जिसमें वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार जैन चेतन ने पढ़ा -ढलती रही धूप बढ़ने लगी परछाइयां ,साथ देने आ गई तन्हाइयां ,वरिष्ठ गजलकार महेश अग्रवाल की गजल देखें -‘तन पर उजली पोशाकें लेकिन मन के काले लोग , ‘ सुरेश पवरा आकाश ने भी खूब तालियां बटोरीं -‘फ़र्ज़ अपने पास उनके पास अधिकार हैं।’
वरिष्ठ कवि प्रदीप श्रीवास्तव ने इस अवसर पर कविता में कहा -‘जिंदगी है सूरज किरण की जिससे फैले उजियारा। व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव ने इस अवसर पर पढ़ा -‘भर आता है मन तब झलक आते हैं आंसू, ‘ वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश पटवा की पंक्तियां थी -मकसद बस एक ही है बंदगी मैं तुझसे ही समझना चाहता हूं। वरिष्ठ कवि लक्ष्मीकांत जबने की पंक्तियां थी -‘झुर्रियां बयान हो गईं चोटें निशान हो गईं।’ वरिष्ठ कवि गोकुल सोनी की कविता थी -‘ अधरों से मोहक मुस्काना सीख गई है।’ कवि मनोज गुप्ता की कविता का एक अंश देखें -‘मैने तुमको तम से प्रति क्षण दूर रखा। ‘ कार्यक्रम का संचालन कर रहे घनश्याम मैथिल अमृत की व्यंग्य क्षणिकाएं भी खूब सराही गईं -‘कौन कहता है आदिवासी भोले भाले हैं ,जब तक हैं भोले नहीं तो भाले हैं ,| कार्यक्रम के अंत में मंजू पटवा ने उपस्थित जनों का आभार प्रकट किया।
