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बचपन प्यारा क्यों? जीवन कंटीला क्यों?

RKTV NEWS/अजय गुप्ता “अज्ञानी” ,29 अक्टूबर।हम सभी इन बातों के चश्मदीद गवाह हैं कि बचपन बहुत प्यारा होता है वहीं जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं जीवन‌ निरश होता जाता हैं। यह प्रश्न मेरे मानसिक पटल को बहुत ही उद्वेलित करता है और मन ही मन अनेकों प्रश्न मन मिजाज में हिलोरे मारने लगते है आखिर ऐसा क्यों होता है? कि बचपन कुसुम सा प्यारा और जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं जीवन कांटों सा टिश भरा होता जाता हैं। इसका परिणाम बहुत विचारिक‌ मंथन करने के बाद पाया कि।
बाल्यावस्था बहुत ही कोमल, निश्छल निर्दोष मधुर जुबान की होती है जो बरबस किसी की निगाहों को अपनी तरफ खिंचने में सक्षम होती हैं।उसकी मुस्कुराती हुई भाव-भंगिमा बरबस लोगों की निगाहें अपने तरफ खिंच लेती है और थोड़ी सी पुचकार पर वो सामने वाले की अंक में जाने का उतावला भी हो जाता है और कठोर निष्ठुर इंसान भी उसे गोद में उठा लेते हैं और पुचकार लेते हैं। बच्चा अपना पराया की भावना को नहीं समझता।
शत्रु कौन हैं?प्रेमी कौन हैं? मां-पिता से उक्त आदमी का क्या संबंध है? वो निश्छल मन बालक नहीं जानता वो बिना बैर भाव के शत्रु से भी प्रेम करता है और कुटुम्ब से भी क्योंकि वो बालक निस्वार्थ निश्छल होता है। दुनिया की विकृतियों से दूर अपने धुन में मस्त होता है। मुस्कान अधर पर होते हैं और चंचलता मन में।परन्तु जैसे-जैसे बालक बड़ा होता जाता है दुनिया को समझने बुझने लगता है मन में अनेकों भाव विकृतियां आने लगती हैं बच्चा अपना हित समझने लगता है और दुनिया के प्रभाव में आ कर स्वार्थ साधने लगता घर परिवार के बातों की आलोचना/अहवेलना करने लगता है। बुराइयां और खोट निकालने लगता है बहस करने लगता अपने बातों को मनवाने की अच्छा/बुरा चेष्टा करता रहता है रूखा बोलने लगता हैं।अपने अक्षर ज्ञान को अपने से बड़ों से भी उम्दा आंकने लगता हैं चूंकि उसने अभी जीवन के थपेड़ो के नहीं देखा होता हैं। इसलिए उसमें इगो सुपर मेसी की भावना जागृत हो जाती है और धीरे धीरे वो प्यारा सा बचपन नजर से उतरने लगता है। मन को चुभने लगता है और यह व्यवहार बच्चों में घर बाहर सभी जगह दिखने लगते हैं। बच्चों पर कई तरह से प्रभाव पड़ने लगते हैं। शुरुआत तो घर से ही होती है “अनुशासित मां बाप ही अनुशासित नागरिक राष्ट्र को सौंप सकते हैं”।
आज के मां बाप में भी कई तरह की विकृतियां आ चुकी है जो किसी से छुपी नहीं है। आज मां बाप आर्थिक उपार्जन और आकुत सम्पत्ति इकठ्ठा करने को ही तरक्की मान चुके हैं।इसी‌ की प्राप्ति के लिए अपना सारा समय और जीवन लगा देते हैं नतीजा यह होता है कि बचपन लावारिस हो जाता है और बच्चों में संस्कार की कमी देखने को मिलती है ऐसे में मैं बच्चों को ज्यादा कसूरवार नहीं मानता बचपन तो सादे कागज जैसा कोरा होता है उस पर जो लिखेंगे वो दिखेगा अब बात रही कि देखना है लिखने वाला कितना हूनर रखता है।मां बाप बनना आसान नहीं है, मां बाप बनने की भी योग्यताएं, समझ और प्राथमिकताएं होनी चाहिए मगर आज की पीढियां मां बाप बनने के अपने योग्यता और कर्तव्यों के प्रति ‌शायद ज्यादा सचेत नहीं हैं या कहें कि बनावटी दिखावटी और भटकाऊं पश्चिमी सभ्यता की तरफ तेजी से भाग रहे हैं और पश्चिमी बुराई को नया एडवांस समझ कर उसे अंगिकार कर रहे हैं। चूंकि अब हम एकल जीवनशैली को अपना चुके हैं संयुक्त परिवार कहीं दिखता ही नहीं इसलिए समाज/परिवार बड़े बुजुर्गो के ज्ञान से मरहूम व अतिम हो चुका है मनमानी को अपना अधिकार समझने लगा है समझने व सहन करने की क्षमताएं गौण हो चुकी है। बिना खुद को आकलन किए देखा देखी आगे बढ़ने की चेष्टा कुचेष्टा करने लगा है। ऐसी भावना वाला युवा ना ही देशी संस्कृति को मान सकता है ना ही पूर्ण रूप से पश्चिमी सभ्यता में ही ढल पाता हैं एक तरह से नया जेनरेशन संकर मानसिकता के हो रहे हैं।
बदलती हुई नयी दुनिया और इंटरनेट क्रांति एक अलग ही ढंग की समाज की संरचना कर रही है जहां हर हाथ में मोबाइल बिना रूके थके खेल रही है एक ही घर में बैठे सभी सदस्य कई कई दिनों तक एक दूसरे से बात नहीं कर पाते हैं क्योंकि सभी सभी के सभी मोबाइल में व्यस्त हैं। इस बेरोजगार देश में किसी के पास फुर्सत नहीं किसी से बात करने को यह क्या हो रहा है हमारा समाज कहां जा रहा है यह कैसी सभ्यता का निर्माण हो रहा है। जहां पर अपनापन खत्म होता जा रहा है प्रेम बंजर होता जा रहा हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर दोषी कौन है मां-बाप बच्चे या व्यवस्था या सरकारें जो नीतियां निर्धारण करती है या खुद समय जो अपना चक्र बदल रहा है। कहीं-कहीं समाज में यह भी दिखने को मिलने लगा है कि मां बाप तो निहायत शरीफ है बचपन में तो अच्छे संस्कारो का संचार किया मगर वह बच्चा जब स्कूल कांलेज और बाहर के बातावरण से घुला मिला व बाहरी दुनिया की चकाचौंध से प्रभावित हुआ तो वो रास्ते बदल कर गलत रास्तों का अनुसरण कर लिया और गुमराह जिंदगी यूं बिखर कर परेशान डिप्रेशन में पड़ गयी कुल मिलाकर यह समय एक सभ्य समाज के लिए संक्रमण युग से गुजर रहा है जहां इंसान मनमानी को अपना अधिकार समझने लगा हैं। जिसका प्रतिफल के रूप क्रुरता, जिद्द, व्यभिचार, असंवेदना, मानसिक असंतुलन के रूप में दिख रहा है। जिसके कारण घर ही नहीं समाज भी टूट रहा है परिवार भी टूट रहा है सच कहें तो खुद इंसान ही अपने खुद के भार से टूट रहा है।

अजय गुप्ता “अज्ञानी”
(लेखक साहित्यकार और सामाजिक विवेचक है। संपर्क: बाबू बाजार, आरा,मो.8228828371)

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