
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)17 अक्टूबर। गुरुवार को महंथ महादेवानन्द महिला महाविद्यालय, आरा में आईजोरा के संयुक्त तत्वावधान में “बहुविषयक शोध, व्यवहार और नवाचार में हाल के रुझान” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। सेमिनार का आरंभ सम्मानित अतिथियों के द्वारा महंत जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुआ। महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. नरेंद्र प्रताप पालित ने स्वागत भाषण देते हुए सभी अतिथियों का स्वागत किया और मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च की वर्तमान जरूरतों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारे समाज की समस्याएं बहुत जटिल है जिसका समाधान किसी एक विषय पर विचार-विमर्श से संभव नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि आज पृथ्वी को बचाने के लिये सतत विकास की पद्धति को अपनाने की जरूरत है ताकि विकास भी हो और पर्यावरण को हानि भी न पहुँचे। वी.के.एस.यू., आरा के प्रो-वाईस चांसलर एवं तीन बार कुलपति रहे नीडोनॉमिक्स स्कूल ऑफ थॉट के प्रवर्तक प्रो. मदन मोहन गोयल ने महंत महादेवनंद महिला महाविद्यालय, आरा में आयोजित बहुविषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “बहुविषयक शोध, व्यवहार और नवाचार में हालिया रुझान” के उद्घाटन सत्र में कहा कि मैं कुरूक्षेत्र से आया हूं और मुझे लगता है कि कुरूक्षेत्र को महाभारत के युद्ध से अधिक विश्व के प्रथम विश्वविद्यालय के लिए जाना जाना चाहिए। प्रो.गोयल के अनुसार “नीडोनॉमिक्स (आवश्यकताओं की अर्थशास्त्र) के माध्यम से शोध को उद्देश्य से जोड़ना सतत भविष्य के लिए अनिवार्य है। प्रो. गोयल ने नीडोनॉमिक्स के स्ट्रीट स्मार्ट फ्रेमवर्क को रेखांकित करते हुए उन्होंने शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे सादगी , नैतिकता , कार्य-उन्मुखता , उत्तरदायित्व और पारदर्शिता जैसे गुणों को अपनाएं ताकि उनका योगदान समावेशी और प्रभावशाली बन सके। उन्होंने नीडोनॉमिक्स के माध्यम से अनुसंधान को उद्देश्य के साथ जोड़ने का आह्वान किया।
इसके बाद मगध विश्वविद्यालय, बोध गया के प्रति कुलपति प्रो. बी.आर.के. सिन्हा ने संगोष्ठी के तीन आयामों–बहुविषयक शोध, व्यवहार और नवाचार पर विस्तार से बात रखी। उन्होंने कहा कि “समाज की जरूरतों के हिसाब से शोध के स्वरूप में आ रहे बदलावों पर विस्तार से बात रखी। उन्होंने कहाँ कि “शोध का असली मतलब तभी है जब वह समाज की बेहतरी में अपना योगदान दे। जैसा कि कोरोना वैक्सीन बना कर वैज्ञानिकों ने समाज को कोरोना महामारी से बचाया। अगले वक्त थे मदन सिंह जो नेपाल के नेपाल से ऑनलाइन जुड़े हुए थे। उन्होंने “भारत और नेपाल में शोध और विकास” विषय पर बात रखी। उन्होंने भारत और नेपाल के आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के विविध आयामों पर विस्तार से चर्चा की। इसके बाद पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रो.गणेश महतो ने “कर्म ही ईश्वर है” विषय पर गीता को संदर्भित करते हुए सारगर्भित वक्तव्य दिया। उन्होंने “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥” और “संरक्षण का नियम” के अंतरसंबंध पर विस्तार से अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने गीता में वैज्ञानिक नियमों और गणितीय सिद्धान्तों की शोधपूर्ण विवेचना की। अगले वक्ता पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक प्रो. उमेश प्रसाद ने सामाजिक विकास में शोध के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। इसके बाद वी.के.एस. यू. के पूर्व प्रति कुलपति प्रो. तपन कुमार सांडिल्य ने गीता के महत्व पर बात करते हुए कहा कि ” गीता किसी सम्प्रदाय विशेष का नहीं बल्कि सामाजिक ग्रंथ है, संवाद ग्रंथ है।” उन्होंने समाज के आर्थिक विकास को रेखांकित करते हुए एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस आदि के सिद्धांतों की चर्चा की और कहाँ कि आज हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल है कि मानव का कल्याण कैसे हो और पृथ्वी और पर्यावरण को कैसे बचाया जाये।” अंतिम वक्ता के रूप में फुटब के अध्यक्ष प्रो. के.बी. सिन्हा ने महाविद्यालय द्वारा आयोजित बहुविषयक संगोष्ठि को छात्र-छात्राओं और शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण बताया। इनके साथ ही उन्होंने कहा कि देश की उन्नति और विकास में हासिये के वर्ग को जोड़ने के लिये शोध के व्यवहारिक पक्ष पर जोर देने की आवश्यकता है। मंच संचालन डॉ विजय श्री तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ स्मृति चौधरी ने किया।इस दो दिवसीय संगोष्ठी के पहले दिन तकनीकी सत्र में बहुत से प्रतिभागियों ने पेपर प्रस्तुत किए।तत्पश्चात् सांध्य 5 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें कॉलेज की छात्रा कोमल कुमारी और साधना कुमारी ने अपने नृत्य से सबका मन मोह लिया।
इस अवसर पर प्राचार्य ओम प्रकाश राम, प्रोफेसर विनय कुमार मिश्रा, प्रोफेसर मीना कुमारी , पद्मश्री भीम सिंह भावेश, डॉ अशोक कुमार, डॉ सुधा रंजनी, डॉ प्रीति आदि उपस्थित थे।
