
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)17 सितंबर। श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् एवं सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा श्रीविश्वकर्मा पूजा की पूर्व संध्या पर “वैदिक अभियांत्रिकी एवं आधुनिक विकास” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। अध्यक्षता करते हुए आचार्य डॉ भारतभूषण पाण्डेय ने कहा कि विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र में भगवान श्रीविष्णु को और पुराणों में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी को विश्वकर्मा कहा गया है। विश्वकर्मा देवशिल्पी हैं। समस्त निर्माण कार्य और विकास कार्यों के योजनाकार और रचनाकार भगवान विश्वकर्मा हैं।वे भवन निर्माण,वास्तु, यंत्र (मशीनरी), उपकरण,साधन आदि सभी के रचनाकार हैं।इसी प्रकार मय दानव को असुरों का विश्वकर्मा कहा जाता है। अर्थात् असुर भी निर्माण व विकास संबंधी कार्यों में वेदों और भगवान विश्वकर्मा के सिद्धांतों का अनुकरण करते हैं। आचार्य ने कहा कि आधुनिक विकास के नाम पर अशास्त्रीय एवं गैर परंपरागत निर्माण किये जा रहे हैं जिससे आज प्रकृति कुपित हो गई है और कई प्रकार के पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न हो गया है।
उन्होंने कहा कि पहाड़ों में जिस प्रकार विनाशलीला शुरू हो गई है और मिनटों में कितने नगर, पर्यटन स्थल व बसावटें मलबे में तब्दील हो जा रही हैं यह आंखें खोलने वाला है। देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा के प्रेरक पूजनोत्सव से शहरीकरण, नगरों के निर्माण, मशीनीकरण और औद्योगीकरण के क्षेत्र में विशेष सावधानी और शास्त्रीय सिद्धांतों के पालन की आवश्यकता है। विश्व की रक्षा और इसकी भलाई के लिए भगवान् विश्वकर्मा के समस्त संकल्प सिद्ध हैं। विश्वकर्मा पूजा के उपलक्ष्य में सभी भारतीय योजनाकारों और अभियंताओं का दायित्व है कि वे वैदिक निर्माण सिद्धांतों तथा भगवान विश्वकर्मा के आदर्शों के अनुरूप विनिर्माण करें और भव्य भारत का उत्कर्ष करें जिससे संपूर्ण विश्व के हित का मार्ग प्रशस्त हो सके। विदेशी योजनाओं की नकल ने सबका अहित और सभी के भविष्य को अनिश्चित कर दिया है। ऐसे में भारतीय सनातन वैदिक निर्माण एवं शिल्प विज्ञान तथा इसके परम प्रस्तोता भगवान विश्वकर्मा के चिंतन को आत्मसात करना समय की मांग है। कार्यक्रम का संचालन मधेश्वर नाथ पाण्डेय एवं धन्यवाद-ज्ञापन सत्येन्द्र नारायण सिंह ने किया।
