‘चलो गांव की ओर’ के तहत प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन व प्रगतिशील लेखक संघ, खैरागढ़ का विशेष आयोजन।

शिक्षक दिवस पर ग्रामवासियों ने शिक्षकों को सम्मानित किया।
खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 7 सितंबर। छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन की दूरगामी योजना ‘चलो गांव की ओर’ का आयोजन ग्राम पंचायत सर्रागोंदी में हुआ। प्रेमचंद-हरिशंकर परसाई जी जयंती पर इसका आयोजन पाठक मंच खैरागढ़ और प्रगतिशील लेखक संघ खैरागढ़ के संयुक्त तत्वावधान में शिक्षक दिवस पर किया गया। इसका विषय था, ‘प्रेमचंद से परसाई तक।’
इस अवसर पर मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. वीरेन्द्र मोहन ने ‘प्रेमचंद से परसाई तक’ पर अपनी बात रखते हुए कहा कि तारीख आगे-पीछे हो सकती है, लेकिन प्रेमचंद और परसाई जी को इस तरह याद करना बहुत बड़ी बात है। ये हमारे पुरखे हैं।
प्रेमचंद आजादी मिलने के पहले और हरिशंकर परसाई आजादी मिलने के बाद के साहित्यकार हैं। जब आजादी का संघर्ष चल रहा था तब हर वर्ग आजादी के संघर्ष से जुड़ा हुआ था। प्रेमचंद कथाओं के माध्यम से आजादी के संघर्ष से जुड़े थे। उनकी रचनाओं में आजादी के संघर्ष और आजादी के मूल्य को देख सकते हैं। इसका आधार उन्होंने किसानों को, मजदूरों को बनाया। आजादी के बाद अंग्रेज तो चले गए, लेकिन अंग्रेजों की प्रवृत्ति यानी वही अफसरशाही, पैसे का बोलबाला वाले लोग यहां दिन-ब-दिन बढ़ते गए। परसाई जी ने इनका विरोधकर अपने साहित्य का आधार बनाया, जिनके केंद्र में जनमानस की करुणा रही। यही करुणा उनके व्यंग्य लेखन की उत्स है। साहित्य में व्यंग्य पहले भी था, लेकिन हरिशंकर परसाई जी ने विपुल व्यंग्य लिखा, जिससे कारण समीक्षकों ने व्यंग्य को विधा माना। इस तरह वे व्यंग्य विधा के जनक हैं। ये दोनों हमारे पुरखे हैं, जो गलत को गलत कहने का साहस रखते थे और हमें संबल देते हैं। साथ ही खराब समय में हमारे लिए रोशनी बनते हुए मनुष्य की मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। ये दोनों मात्र सहित्यकार ही नहीं, समाज सुधारक भी हैं। ये दोनों पुरखे वट वृक्ष की तरह हैं, जिनकी छाया में हम सब फल-फूल रहे हैं। 
अध्यक्षीय संबोधन में कवि संकल्प पहटिया ने कहा कि प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई जी दोनों हमारे धरोहर हैं और दोनों की जयंती में मात्र बाईस-तेईस दिन का अंतर है। इसीलिए ‘प्रेमचंद से परसाई तक’ के आयोजन की परिकल्पना की गई। राजे-महाराजे का इतिहास तो इतिहास की किताबों में मिलता है, लेकिन हमारा याने जनमानस का इतिहास तो प्रेमचंद और हरिशंकर परसाई की किताबों में मिलता है। इसीलिए आजादी के पहले के भारत को जानना है, तो प्रेमचंद को पढ़िए और आजादी के बाद के भारत को जानना है तो हरिशंकर परसाई जी को पढ़िए। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को सुनते हुए नवाबकालीन परिदृश्य के साथ-साथ आज का परिदृश्य भी सामने आ रहा था। आजकल क्रिकेट और आईपीएल के समय आसपास के बहुत से लोगों की नजर में देश-दुनिया के परिदृश्य में रहता ही नहीं। और ऐसे लोग मोबाइल में टीम बनाते और जु़आ-सट्टा की चपेट में रहते हैं। ‘टार्च बेचने वाले’ बाबागिरी पर व्यंग्य है और आजकल बाबागिरी हर तरफ व्याप्त होता जा रही है। इसे हरिशंकर परसाई जी ने इस रचना में रेखांकित किया। स्वागत भाषण सरपंच प्रतिनिधि रामावतार साहू ने किया। उन्होंने कहा कि गुरुजनों और अतिथियों ने यहां पधारकर हमारे ग्राम पंचायत सर्रागोंदी को प्रेमचंद जी और हरिशंकर परसाई जी के साहित्य से प्रकाशमय कर दिया।
कवि गिरधर सिंह राजपूत ने प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का वाचन किया। इसका कथासार बताते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जीवन यदु ने कहा कि कथा का मूल ‘जस हाल राजा, तस हाल प्रजा’ वाली कहावत है। कहानी में नवाब झूठी शान के मुगालते में थे और मनसबदार झूठी शान के मुगालते रहते हुए शतरंज खेल नशे में रहते थे। इसी के चलते अंग्रेजों ने अवध पर कब्जा कर लिया।
व्यंग्यकार रवींद्र पांडेय ने हरिशंकर परसाई जी की व्यंग्य रचना ‘टार्च बेचने वाले’ का वाचन किया। इसका कथासार बताते हुए साहित्यकार और पत्रकार अनुराग तुरे ने कहा कि कथा मूलतः अंधकार का डर दिखाकर, उससे पैदा होने वाले व्यवसाय पर आधारित है। आजकल अंधकार के डर से पैदा होनेवाले व्यवसाय का बोलबाला है और इसमें मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
साहित्यकार विनयशरण सिंह ने कहा कि ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के चरित्रों की तरह आज भी लोग झूठी शान के लिए मरने-मारने के लिए तैयार रहते हैं। उनकी आंखों में देश-दुनिया नहीं होती है। ‘टार्च बेचने वाले’ आज से लगभग साठ पहले लिखी गई रचना है। आज भी प्रासंगिक है। आजकल के बाबा माया-मोह, धन-दौलत से दूर रहने की बात करते हैं। पर उनके पास कितनी धन-दौलत और उसके प्रति मोह-माया है, किसी छिपा नहीं है। समाजसेवी अनुज देवांगन ने आयोजन की सराहना की।
संचालन करते हुए पाठक मंच खैरागढ़ के संयोजक डॉ. प्रशांत झा ने कहा कि प्रेमचंद जी और हरिशंकर परसाई जी अपने साहित्यिक अवदान के कारण भारतीय समाज के प्रकाश स्तंभ हैं। शिक्षक दिवस पर सभी सदस्य शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि हमारे बीच हमारे पथ-प्रदर्शक के रूप में डॉ. वीरेन्द्र मोहन जी, डॉ. जीवन यदु जी, विनयशरण सिंह जी हैं। साथ ही नवजवान शिक्षकों के रूप टीकाराम देशमुख जी, रवि झोंका जी, गिरधर सिंह राजपूत जी और संकल्प पहटिया जी भी हैं। इन सबका सम्मान हमारा सौभाग्य है। तत्पश्चात उनके मार्गदर्शन में सभी शिक्षकों का गांव और ग्राम पंचायत के सहयोग से सम्मान किया गया।
शिक्षक सम्मान के बाद प्रसिद्ध गीतकार और पाठक मंच व प्रलेस के वरिष्ठ सदस्य डॉ. जीवन यदु ने उपस्थित गांववासियों आग्रह पर बेरोजगारी की समस्या व्यंग्य करते हुए छतीसगढ़ी गीत ‘चढ़-चढ़ भैया तैं नौकरी के रेल’ का सस्वर पाठ किया। इस आयोजन को मूर्त रूप देने में पाठक मंच और प्रलेस के सदस्य तीरथ कुमार चंदेल और जीवेश सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आयोजन के बैकग्राउंड को रवि झोंका ने टीकाराम देशमुख के साथ गांव वालों के सहयोग से डिजाइन किया।
आभार प्रदर्शन करते हुए ग्रामवासी प्रताप साहू ने कहा कि हमारे ग्राम पंचायत को और भी मौका दें, हम इसके लिए हरदम तैयार रहेंगे। आयोजन की उल्लेखनीय बात यह रही कि महिलाओं की उपस्थिति अच्छी-खासी रही। श्रीमती फुलेश्वरी साहू (सरपंच), मेघु साहू (उपसरपंच), रामावतार, कैलाश यादव (सचिव), मुकेश सेन, सियाराम साहू, खेमलाल साहू, गर्गेश बेरवंशी, तेजराम साहू, फागू राम साहू, दिलीप पटेल, चेतन पटेल, भुवनेश्वर यादव, श्याम लाल साहू, दीपक सिंह राजपूत, हृदय साहू, रामकुमार साहू, श्रीमती कुमारी सेन, श्रीमती सेवती साहू, श्रीमती पुनीता बाई साहू, श्रीमती अमर बाई, श्रीमती चमेली देवी साहू, श्रीमती हिरौदी साहू, श्रीमती चंदा यादव, श्रीमती सरिता बाई साहू ने अपनी उपस्थिति देकर आयोजन को सफल बनाया।


