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भोजपुर:युक्त से मुक्त हो जाओ : मुनिश्री विशल्यसागर

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)05 सितंबर।धर्मनगरी आरा में विराजमान दिगंबर जैन मुनि श्री विशल्यसागर जी महाराज ने धर्मसभा में आकिंचन धर्म के संदर्भ में बोले कि आकिंचन का अर्थ है-जो अपना नहीं है जिसे अपना समझ रखा है उसे बिना खेद के त्याग देना। आकिंचन धर्म कहता है कि रिक्त हो जाओ। सहित से रहित हो जाओ, युक्त से मुक्त हो जाओ, सृजन से विसर्जन की ओर कदम बढ़ाओ ताकि आत्मा की निर्मलता का विकास हो। जब तक संसार की किसी भी वस्तु से हमारा सम्बन्ध है तब तक बन्धन है, जब हम राग से सम्बन्ध बनाते है तब ही हमारे भीतर भिखारीपन आ जाता है। पदार्थ प्राप्ति की आकांक्षा जागृत हो जाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाए कि एक सन्त के मन में 50 पैसे दान करने का भाव उत्पन्न हुआ, उसने सोचा 50 पैसे दान दूंगा, पर उसे दूंगा, जो सबसे बड़ा भिखारी होगा। काफी भिखारी आये, दान नहीं दिया। एक दिवस सड़क के किनारे सन्त बैठे थे सामने से सम्राट सेना सहित निकला। सन्त ने 50 पैसे का सिक्का उनकी तरफ फैंक दिया। सम्राट सहम गया – और तुरंत बोल पड़ा कौन बेवकूफ। इस प्रकार की गुस्ताखी कर रहा है। सम्राट ने निगाहें ऊपर की देखा कि यह तो ‘सन्त’ है। सम्राट ने ‘प्रश्न किया यह 50 पैसा क्यों फेंका? सन्त ने उत्तर दिया-सबसे बड़े भिखारी को दान देने का संकल्प था। आपसे बड़ा भिखारी कोई नहीं मिला। सम्राट ने कहा-अरे! क्या तुम्हें दिख नहीं रहा छत्र, सिंहासन, बग्गी, सेना, तब सन्त ने कहा सब दिख रहा है पर यह नहीं है। अरे अगर आपके पास छत्र, सिंहासन, सेना, धन-सम्पदा आदि होते तो फिर आप दूसरे सम्राट पर आक्रमण करने क्यों जाते? क्यों किसी को लूटते, हत्या करते। भिखारी ही दूसरे के द्वार पर ऐसा करते है। आदमी के भीतर ही सुख का खजाना है पर भटकता है बाहर की ओर। पर बाहर की दौड़ मृत्यु दे सकती है, सुख नहीं। पदार्थ के पाने की दौड़ ही मौत है। परमार्थ को पाने की साधना ही मोक्ष हैं। एक बार हम भीतर के दृष्टा को देखें उसे पहचान लेंगे तो सहज ही आकिंचन धर्म का आगमन होगा। मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि भगवान महावीर स्वामी जल मंदिर में संध्या समय में भक्तामर पाठ का आयोजन, स्वर्गीय मनीष जैन की पुण्य स्मृति में परिमल जैन परिवार के द्वारा किया गया। जिसमें सैकड़ों की संख्या में भक्तगण शामिल हुए। भक्तामर पाठ के समापन पर प्रसाद वितरण किया गया। उन्होंने बताया कि भक्तामर स्तोत्र, आचार्य मानतुंग के द्वारा रचित एक दिव्य स्तुति है, जो 48 श्लोकों से बनी है, हर श्लोक में विशेष ऊर्जा व शक्ति है। भक्तामर पाठ के करने से मानसिक शांति एवं सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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