
आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)03 सितंबर।श्री 1008 दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में विराजमान प.पू. श्रमण मुनि श्री 108 विशल्यसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए तप धर्म पर व्याख्यान करते हुए कहे कि ऊर्जा का रुपान्तरित करने का नाम है- ‘तपस्या’ स्वयं में स्वयं के गवाह बनने का नाम है तपस्या। मन के सागर में उठती इच्छाओं की लहरों को समाप्त कर देने का नाम है तपस्या। स्वयं के परमात्मा को जाग्रत करने, ध्यान- साधना करने का नाम है- तपस्या। जब आत्मा में संयम का जागरण होता है तभी व्यक्ति तपस्या को स्वीकार करता है। व्यक्ति को तीन प्रकार का तप हमेशा करते रहना चाहिए पहला शरीर का तप, दूसरा वाणी का तप तथा तीसरा मन का तप जिसमें पहला शरीर का तप। शरीर से झुकना, भगवान की पूजा करना, गुरुजनों का सम्मान करना, दूसरों की मदद करना। ये शरीर का तप है। शरीर के तप के मायने ये नहीं है कि धूप में बैठ जावें। शरीर के तप के मायने है कि हम शरीर से भगवान के प्रति विनय व्यक्त करें, पूज्य पुरुषों के प्रति विनय व्यक्त करें। अपनी पाँचों इन्द्रियों और मन को भगवान की सेवा में लगा दें, दूसरे जीवों की मदद करने में लगा दें ये है शरीर का तप। दूसरा वाणी का तप। हमेशा मधुर वचन बोलना, प्रेम से भरकर वचन बोलना, सत्य वचन बोलना। इतना ही नहीं, हमेशा जिनेन्द्र भगवान के कहे हुए वचनों को दोहराते रहे। वाणी का तप करना है तो अपने मुहँ से शुभ-वचन, मधुर वाणी बोलना चाहिए। तीसरा मन का तप। संक्लेष से बचें रहे, मन में हमेशा अच्छे विचार करना, मन की प्रसन्नता बनी रहे इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि जो व्यक्ति सुख और दुःख में अपनी मन की प्रसन्नता को नहीं खोता वो व्यक्ति अपने मन का तप कर रहा है। आज मन से तप, बहुत कम लोग करते हैं। शरीर से तप, शरीर तपाने वाला तप, शरीर झुकाकर विनय करना, पूजा पाठ करना ये तो बहुत कम है। दूसरों की मदद करना , यहाँ कोई मुश्किल से चल पा रहा हो तो उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर तक ले जाना। ये तो बहुत कठिन है, आज तो हमारा उपवास है आज थोड़े ही हम किसी की मदद कर सकते हैं। जबकि आचार्यो ने कहा है कि- दूसरों की वैयावृत्ति/सेवा करना, जो तपस्वी हैं उनकी सेवा करना, जो निरन्तर अपने आत्मकल्याण में लगे हुए हैं उनकी सेवा करना, साधर्मी की सेवा करना, ये सब शरीर के तप हैं और साथ में मन की प्रसन्नता हमेशा बनी रहे । शरीर से भी मन से भी वाणी से भी रोज-रोज ऐसी तपस्या करने के लिए अभ्यास करना चाहिए जिससे हमारी कर्मों की निर्जरा होती रहे। मीडिया प्रभारी निलेश कुमार जैन ने बताया कि जैन श्रावकगण जैन मंदिरों में जाकर श्रीजी के चरणों में धूप अर्पित किए। जैन धर्म का पवित्र पर्व सुगंध दशमी हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धूप दशमी जैन धर्म में आत्मा की शुद्धि, संयम और सद्कर्मों के लिए है, इस दिन उपवास, मंदिर पूजा, स्वाध्याय और धर्मचिंतन के द्वारा पाँच पापों का त्याग कर कर्मों का क्षय करने और मोक्ष प्राप्त करने का संकल्प लिया जाता है।
