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स्वतंत्रता में साहित्यकारों औऱ कवियों की विशेष भूमिका

गोकुल सोनी

भोपाल/मध्यप्रदेश (विशेष अनुरोध पर साहित्यकार ,गोकुल सोनी की कलम से) 16 अगस्त।सन 1757 में ही प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन स्थापित कर लिया था या यूं कहें कि भारत को गुलाम बना लिया था। उस काल खण्ड में आम जनता भले ही सीधी सादी रही हो परंतु साहित्यकारों और कवियों की स्वतंत्र चेतना सदैव जागृत और मुखर रही तथा अधिकांश साहित्यकारों ने अपने अपने ढंग से साहित्य के माध्यम से जनजागृति का काम किया और गुलामी के प्रतिरोध हेतु जनता के मानस को तैयार किया। भारत की स्वतंत्रता केवल तलवार और बंदूक से नहीं जीती गई, बल्कि शब्दों की ताक़त ने भी इस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आलेख में मैं आपको बताऊंगा कि
भारत की आज़ादी के आंदोलन में साहित्यकारों और कवियों का किस तरह महत्वपूर्ण और निर्णायक योगदान रहा है।
जब देश गुलामी के दौर में अंग्रेजों के अत्याचारों से जूझ रहा था, तब वे कवि और साहित्यकार ही थे जिन्होंने जनमानस में आजादी पाने की ललक को अपने साहित्यिक आलेखों और कविताओं के माध्यम से जीवित ही नहीं रखा, वरन सतत संघर्ष करने की प्रेरणा दी। स्वतंत्रता प्राप्ति की आग को लोगों के दिल जलाए रखा। उस दौर का लेखन मात्र मनोरंजन के लिए नहीं होता था, बल्कि साहित्य आज़ादी की प्रेरणा, राष्ट्रवादी चेतना और जनजागरण का सबसे शक्तिशाली हथियार बन गया था।
19वीं शताब्दी के मध्य से ही साहित्यकारों ने अंग्रेज़ी शासन की नीतियों पर सवाल उठाने और जनता को एकजुट करने का कार्य प्रारंभ कर दिया।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने सन 1882 में उपन्यास आनंदमठ लिखा जिसमें रचा गया गीत “वंदे मातरम्”, स्वतंत्रता आंदोलन का अमर नारा बन गया।
स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण और लेखन, जैसे “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत” से युवाओं में जोश भर दिया। उस युग के क्रांतिकारी कविताएँ और गीत अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ असहयोग और बलिदान की प्रेरणा गए।

माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूँ, भाग्य पर इठलाऊँ॥

मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ में देना तुम फेंक॥

मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥

यह कविता बलिदान और मातृभूमि के लिए मर मिटने की प्रेरणा देने वाला अमर मंत्र बन गई।

राम प्रसाद बिस्मिल की
“सरफ़रोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना, बाजुए कातिल में है।”
तो जैसे क्रांतिकारी आंदोलन का गान बन गई थी।

सुभद्राकुमारी चौहान का “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” बच्चे बच्चे की जुबान पर चढ़ गया। इस कविता ने वीरांगना लक्ष्मीबाई की गाथा से स्त्रियों और युवाओं को साहस दिया।

अल्लामा इक़बाल का गीत
“सारे जहाँ से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा” देश का गौरव गान और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बना।
पत्रकारों का भी आजादी के आंदोलन में कम योगदान नहीं है। पत्रकार बंधु पत्र पत्रिकाओं में अपने आलेखों को आंदोलन के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, केसरी और मराठा पत्रों में लेख लिखकर स्वराज का संदेश देते रहे। गणेश शंकर विद्यार्थी के “प्रताप पत्र” में अनेकों क्रांतिकारी आलेख प्रकाशित हुए जो अंग्रेजों की आंखों में बेहद खटकते थे।
लाला लाजपत राय – अपने आलेखों और भाषणों में अंग्रेज़ों की नीतियों का बड़ी बारीकी से पर्दाफाश किया करते थे।
महात्मा गांधी के “यंग इंडिया” और “हरिजन” में प्रकाशित आलेखों से सत्याग्रह और अहिंसा का प्रचार करना जहां एक बड़े पाठक वर्ग ने आजादी पाने की जिजीविषा पैदा करते थे, वहीं बरतानिया हुकूमत हिल जाती थी। वह सदैव इस उलझन में रहती थी कि आजादी के आंदोलन में हिंसक हो गई भीड़ से तो पुलिस का दमन चक्र चलाकर निबटना आसान है परंतु इस वैचारिक आग लगाने वाले अहिंसक बूढ़े आदमी से कैसे निबटा जाए?
भगत सिंह ने “मैं नास्तिक क्यों हूँ” और अन्य लेखों में स्वतंत्रता की क्रांतिकारी दृष्टि और इस हेतु गरम दल का पक्ष बड़ी मजबूती से रखा।
भारत की आत्मा गांवों में बसती है और “नाटक और लोक साहित्य” लेखन की ऐसी विधा है जो ग्रामीण जनमानस के अधिक करीब है। अनपढ़ व्यक्ति भी इनके माध्यम से दिए गए संदेशों को भली भांति समझ पाता है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1875 में “भारत दुर्दशा” और 1881 में नाटक “अंधेर नगरी” लिखकर जनमानस का ध्यान गुलामी की ओर खींचा और इन नाटकों और लोकगीतों ने अनपढ़ जनता तक भी स्वतंत्रता का संदेश पहुँचाया।
द्वारका प्रसाद मिश्र ने कालापानी नाटक (अंडमान की कालकोठरी का चित्रण) में ऐसा मार्मिक चित्र खींचा कि दर्शकों को अंग्रेजों से घृणा हो गई।
अवधी, भोजपुरी, पंजाबी और बंगला में रचे गए भजन और लोकगीत जैसे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ द्वारा 1924 में कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया गीत
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा” गाँव-गाँव में गूंजने लगा।

“जय भारत, जय भारत” लिखकर रवींद्रनाथ ठाकुर ने स्वाभिमान का संदेश दिया तो “उठो जवानो ” लिखकर काजी नजरुल इस्लाम भी क्रांतिकारी चेतना जागृत करने में पीछे नहीं रहे।
कई साहित्यकारों ने केवल लिखकर ही नहीं, बल्कि खुद स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लेकर जेल यात्राएँ कीं, यातनाएँ सही और प्राणों की आहुति दी। उनकी लेखनी और कर्म दोनों ने आज़ादी की लौ बुझने नहीं दी।
आजादी के आंदोलन में हम खून में रवानी पैदा कर नस नस में जोश भर देने वाले कवि प्रदीप की बात न करें तो एक बहुत बड़ा अध्याय छूट जाएगा।
कवि प्रदीप का जन्म मध्य प्रदेश के बड़वाह जिला उज्जैन में सन 1915 में हुआ था उनके गीतों में जहां आजादी प्राप्त करने का आव्हान था वहीं आजादी के बाद सपनों के टूट जाने की व्यथा भी मौजूद है जिससे उनके गीत आज भी सर्वाधिक प्रासंगिक हैं।
पांच दशकों के करियर में कवि प्रदीप ने करीब 1,700 गाने लिखे और राष्ट्रवादी कविताएँ लिखीं, जिनमें 72 फ़िल्मों के गीत शामिल हैं, जिनमें फ़िल्म बंधन (1940) में “चल चल रे नौजवान” गीत
दूर तेरा गांव
और थके पांव
फिर भी तू हरदम
आगे बढ़ा कदम
रुकना तेरा काम नहीं
चलना तेरी शान
चल-चल रे नौजवान
चल-चल रे नौजवान.

देश के नवयुवकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के लिए लिखा गया यह गीत इतना पसंद किया गया कि हर जगह गाया जाने लगा. यह गीत जन जागरण के लिए प्रभात फेरियों का मंत्र बन गया.
उस दौर के बारे में मेरे पिता और बाबा मुझे बताते थे कि सुबह ब्रम्ह मुहूर्त में लगभग 4 बजे से उठकर हारमोनियम, दिल, और मंजीरे के साथ आजादी के दीवाने और इस तरह के गीत गाते हुए एवं भजन गाते हुए गांव की गलियों में प्रभात फेरी लगाते थे।

सन 1943 में लिखा कवि प्रदीप के गीत

आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है,

दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिंदुस्तान हमारा है.

अंग्रेजों को बहुत चुभता था।
चल चल रे नौजवान’ के बाद यह ऐसा गीत था जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का नारा बन गया था. जनता एकजुट हो गई. ब्रिटिश सरकार को यह नागवार गुजरा. डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स की दफा 26 के तहत गीतकार प्रदीप पर जांच बैठा दी गई. अभियोजन अधिकारी धर्मेंद्र गौड़ ने मामले की जांच के बाद लिखा कि ‘इस गाने में प्रदीप ने जर्मनी और जापान को अपना निशाना बनाया है अंग्रेजों को नहीं. प्रदीप धोती कुर्ता पहनते जरूर है पर कांग्रेसी नहीं हैं और क्रांतिकारी भी नहीं हैं.
वास्तव में कवि प्रदीप ने चतुराई दिखाई थी। वे जानते थे कि इस गीत पर अंग्रेज हायतोबा मचाएंगे, इस कारण उन्होंने गीत में एक पंक्ति डाल दी थी- ‘तुम न किसी के आगे झुकना, जर्मन हो या जापानी.’ यही पंक्ति अभियोजन अधिकारी की रिपोर्ट का आधार बनी और चाह कर भी अंग्रेज सरकार कवि प्रदीप पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकी.
आजादी के बाद देश को जो हालात बने उनको देखते हुए कवि प्रदीप बहुत दुखी थे। उनके मन में प्रश्न उठते थे कि आज देश में जो हालात क्या इसी के लिए शहीदों ने अपना बलिदान दिया तब उनकी कलम ने एक ऐसा विलक्षण गीत लिखा जो आज भी अनेकों ऐसे प्रश्न उठाता है जिनका उत्तर आज भी मिलना शेष है।

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान,

सूरज ना बदला, चांद ना बदला, ना बदला रे आसमान,कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

आया समय बड़ा बेढंगा, आज आदमी बना लफंगा,कहीं पे झगड़ा, कहीं पे दंगा, नाच रहा नर होकर नंगा,

छल और कपट के हांथों अपना बेच रहा ईमान,कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

राम के भक्त, रहीम के बंदे, रचते आज फरेब के फंदे,कितने ये मक्कार ये अंधे, देख लिए इनके भी धंधे,

इन्हीं की काली करतूतों से हुआ ये मुल्क मशान,कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान.

सन 1962 में चीन का युद्ध हुआ उसके बाद भारत-चीन युद्ध के शहीदों को याद कर लिखा गया उनका गीत
ए मेरे वतन के लोगो
जरा आंख में भर लो पानी
जो शहीद हुए हैं उनकी
जरा याद करो कुर्बानी
जब लता मंगेशकर ने पहली बार 27 जनवरी, 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया तो पहली पंक्ति गाते ही स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया. सब स्‍तब्‍ध. आंखों में आंसू. गाना पूरा होने के बाद पंडित नेहरू ने लता मंगेशकर को पास बुला कर कहा ‘लता, तुमने आज मुझे रुला दिया’.

फ़िल्म जागृति (1954) का गीत “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ
झांकी हिंदुस्तान की
इस धरती से तिलक करो
ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम! वंदे मातरम!”
और
“दे दी हमें आज़ादी
बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के संत तूने
कर दिया कमाल”
कवि प्रदीप ही एक मात्र ऐसे कवि थे जिन्होंने भारत की आजादी पर सर्वाधिक गीत लिखे और जिनके गीतों ने आजादी के पूर्व से ही नहीं आजादी के बाद तक देशभक्ति की अलख जगाई।
हिंदी, उर्दू, बंगला, पंजाबी, तमिल आदि भाषाओं में रची गई देशभक्ति रचनाओं ने सांस्कृतिक पुल का काम किया। इस तरह 19वीं और 20वीं सदी में साहित्य ने लोगों में देशभक्ति, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की लालसा जगाई।
लेखकों और कवियों ने अंग्रेज़ी शासन की कुरीतियों, शोषण और अन्याय को उजागर किया।
कविताओं, नाटकों, कहानियों और लेखों के माध्यम से जनता को यह बताया गया कि गुलामी अपमान है और स्वतंत्रता हमारा अधिकार है।
यदि हम उसमें साहित्य और कवियों के योगदान को न गिनें तो भारत की स्वतंत्रता की गाथा अधूरी ही रहेगी। उनके गीत, कविताएँ, नाटक और आलेख—सबने मिलकर देश के हर कोने में स्वतंत्रता का सपना रोपा। लेखनी ने वह कर दिखाया जो तलवार से भी कठिन था—जन-जन के दिल में आज़ादी की लौ जलाना।
इसलिए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साहित्य एक मौन लेकिन अजेय योद्धा था।

(लेखक :गोकुल सोनी,साहित्यकार,उपाध्यक्ष, लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल है।मेल gokulsoni16@gmail.com)

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