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पटना: बिहार राज्य अभिलेखागार द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ।

पटना/बिहार(डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)23 जुलाई।भारतीय सैन्य इतिहास लेखन में अभिलेखीय दस्तावेजों पर आधारित शोध कार्य को बढ़ावा देने एवं बिहार राज्य अभिलेखागार को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक उत्कृष्ट शोध संस्थान के रूप में विकसित करने के लिए बिहार राज्य अभिलेखागार द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र का आरंभ अभिलेख निदेशक डॉ. मो. फैसल अब्दुल्लाह के स्वागत भाषण के साथ हुआ। अभिलेख निदेशक द्वारा देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के इतिहासकारों, नेशनल डिफेंस कॉलेज, इंडियन मिलिट्री अकादमी, यूनाईटेड सर्विस इंस्टिच्यूशन ऑफ इंडिया, एवं सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारियों का अभिनंदन किया गया। सेमिनार की विषय वस्तु ‘Indian Warfare, Strategies and Peace Through The Ages’ पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास पिछले तीन हजार वर्षों से सैन्य संघर्षों, रणनीतिक नवाचारों और युद्ध-शांति पर दार्शनिक विचारों के एक समृद्ध अनुभव को दर्शाता है। इससे न केवल देश की भौगोलिक सीमाओं को आकार दिया बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक परिदृश्य पर भी गहरा प्रभाव डाला है। इस परिप्रेक्ष्य में सेमिनार के विषय की प्रासंगिकता निहित है।
विशिष्ट अतिथि निशीथ वर्मा, अपर सचिव, मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग ने कहा कि प्राचीन काल से आधुनिक युग तक युद्धशैली एवं नीतियों में निरंतर परिर्वतन हुए है, जिन्होने इतिहास को एक नई दिशा दी है। बिहार युद्ध के साथ-साथ शांति के प्रयासों का भी साक्षी रहा है। गौतम बुद्ध, सम्राट अशोक ने इसी भूमि से अहिंसा और शांति का संदेश दिया।
विशिष्ट अतिथि सुमन कुमार, अपर सचिव, राज्यपाल सचिवालय ने कहा कि सभ्याताओं और साम्राज्यों के उत्थान और पतन में युद्ध तकनीकों की महत्वपूण भूमिका रही है। युद्ध के कारण विश्व में कई परिवर्तन होते रहे हैं। लेकिन शांति और कूटनीतिक प्रयासों का विशेष महत्व है क्योंकि यहीं विश्व के विकास में सहयोग करती है।
मुख्य अतिथि मो. शादान जेब खान, मुख्य सुरक्षा आयुक्त, आर. पी. एफ ने कहा कि यह सेमिनार प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल के बीच शैक्षिणक संवाद को बढ़ावा देने का उत्कृष्ट प्रयास है, जिसमें विद्वानों को भारतीय संदर्भ में सैन्य इतिहास, रणनीतिक विचार, कूटनीति और शांति अध्ययन के विषयों पर गहराई से विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
प्रो. कौशिक रॉय, जादवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता ने ‘Supplying Warfare, Logistic and British Victory During The Rebellion’ विषय पर मुख्य आलेख पाठ प्रस्तुत करते हुए कहा कि 1857 के विद्रोह में संसाधनों की भूमिका महत्वपूर्ण थी, जिसने ब्रिटिश विजय पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला। ब्रिटिशों ने केन्द्रीकृत नौकरशाही, कुशल आपूर्ति लाइनों और वैश्विक समुद्री संबंधों का लाभ उठाया। इसके विपरीत विद्रोहियों को विकेन्द्रित नियंत्रण और पुराने प्रशासनिक दृष्टिकोणों के साथ संघर्ष करना पड़ा। उन्होने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते हुए कहा की स्वतंत्रता संघर्ष में विद्रोही सैन्य गतिविधियों और अहिंसा-सत्याग्रह दोनोकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत में सैन्य इतिहास लेखन की समस्याओं की चर्चा करते हुए एक नए दृष्टिकोण से अभिलेख आधारित इतिहास लेखन पर बल दिया।
मेजर जनरल विक्रांत देशपांडे, नेशनल डिफेन्स अकादमी ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र की चर्चा करते हुए कहा कि कौटिल्य के सिद्धांत की समकालीन रक्षा, रणनीतिक अध्ययन एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय में प्रासंगिकता है।
डॉ. तोसाबन्ता पधान, नालन्दा विश्वविद्यालय, राजगीर ने बताया कि राजगीर में हाल के पुरातात्विक उत्खननों में बिहार के प्राचीन किलों और रणनीतिक सैन्य वास्तुकला से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए है। साइक्लोपियन वॉल, जो 200 से अधिक बस्तियों और द्वारों के साथ एक विशाल पत्थर की संरचना है, प्रारंभिक भारतीय सैन्य इंजीनियरिंग की उदाहरण प्रस्तुत करती है।
प्रो. नृपेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया ने अकबर के सुलह-ए-कुल की चर्चा करते हुए कहा कि यह सार्वभौमिक सहिष्णुता आधारित थी। अकबर विभिन्न धर्मों के सह अस्तित्व में विश्वास रखते थे और राज्य में शांति और सौहार्द के लिए सभी समुदाय की एकता चाहते थे। अकबर के सुलह-ए-कुल को विविधता वाले समाज में शांति और सौहार्द कायम रखने हेतु एक मॉडल के रूप में देखा जा सकता है।
मेजर जनरल पी. के गोस्वामी यूनाईटेड सर्विस इंस्टिच्यूशन ऑफ इंडिया, नई दिल्ली ने भारतीय दर्शन और संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति प्रयास पर अपने आलेख में बताया कि भारत हमेशा से मानवता का कल्याण का पक्षधर रहा है। भारत ने न केवल संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शांति प्रयासों में सैन्य सहायता उपलब्ध करायी है बल्कि भारत वह पहला देश है जिसने प्रथम ‘All-Woman Formed Police Unit’ (FPU) को 2007 में यूएन के शांति प्रयासों के लिए लाइबेरिया में भेजा था। यह लैंगिक विभेद को समाप्त करना का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
सेमिनार के तीन सत्रों में कुल 19 आलेख प्रस्तुत किए गए। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय सत्र की अध्यक्षता क्रमशः प्रो. (डॉ०) सुनीता शर्मा, बी. डी. कॉलेज, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना, प्रो. शांतनु चक्रवर्ती, कलकत्ता विश्वविद्यालय, कोलकाता एवं डॉ. रचना सिंह सह प्राध्यापक, हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली द्वारा की गई। सेमिनार में विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए इतिहासकारों एवं रक्षा विशेषज्ञों प्रो. अनिरूद्ध वी. कनिसेट्टी, प्रो. अताउल्लाह, प्रो. नृपेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, प्रो. शुभ्रा सिन्हा, डॉ. रवि शंकर कुमार चौधरी, डॉ. सईद शाहिद अशरफ, प्रो. (डॉ०) सुनीता शर्मा, प्रो. (डॉ०) गिरीश चन्द्र पाण्डे, चेन्नी वलावन, सब्यासाची दासगुप्ता, डॉ. मनीता कुमारी यादव, डॉ. वन्दना सिंह, मेजर जनरल विक्रांत देशपांडे, जीपी कैप्टन सुखबीर कौर मिन्हास, कर्नल एस. रवि प्रकाश, बिग्रेडियर कृष्णा राज, एवं कर्नल एस. के. बोस आदि ने आलेख प्रस्तुत किए।

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