
RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)14 अगस्त।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने सृष्टि की रचना पर विस्तार से प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि जब दुनिया में कोई नहीं था, उस समय केवल एकमात्र नारायण थे। श्रीमद् भागवत के अनुसार सृष्टि से पहले, सृष्टि के मध्य में और सृष्टि के अंत के बाद केवल श्रीमन नारायण ही रहते हैं। बहुत दिनों के बाद नारायण से अहलादीनी शक्ति लक्ष्मी जी प्रकट हुई। जिसके बाद नारायण का नाम श्री लक्ष्मी नारायण हो गया।
लक्ष्मी जी के प्रकट होने के बाद लक्ष्मी जी ने भगवान श्रीमन नारायण से कहा कि सृष्टि का विस्तार किया जाए। भगवान ने कहा नहीं सृष्टि विस्तार की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि सृष्टि विस्तार के बाद लोग अपने मनमाने ढंग से काम करने लगते हैं। इसीलिए मुझे सृष्टि विस्तार में रुचि नहीं है। लक्ष्मी जी के बार-बार कहने के बाद भगवान श्रीमन नारायण सृष्टि विस्तार के लिए तैयार हुए। सबसे पहले भगवान नारायण ने जल को प्रकट किया। उस समय संसार में केवल जल था। भगवान जल में ही वास कर रहे थे।
सृष्टि विस्तार के लिए नारायण के नाभि से भगवान ने कमल को प्रकट किया। जिसके बाद कमल से एक बालक प्रकट हुए, वह बालक प्रकट होते ही पूछने लगे हम कौन हैं, हमें क्या करना है, मुझे क्यों बुलाया गया है। इस प्रकार से वह बालक अलग-अलग दिशाओं में सिर घूमा करके यही सवालों को बार-बार दोहरा रहे थे। जिनका आगे चलकर के नाम ब्रह्मा जी हुआ।
वहीं बालक जिस दिशा में सिर घुमाए तो उनका एक सिर बढ़ जाता था। इस प्रकार से चारों दिशाओं में उनका सिर घूमा, जिसके कारण उनका सिर और बढ़ गया। पहले से एक सिर था और चार दिशाओं में घूमने के कारण उनका सिर पांच हो गया। वही ब्रह्मा जी हुए
जब ब्रह्मा जी पूछ रहे थे कि हमें क्या करना है, उसी समय आकाश से आकाशवाणी हुई। आपको तप करना है। ब्रह्मा जी पूछ रहे हैं कि तप क्या होता है, कैसे किया जाता है। वही आकाशवाणी हुआ कि आप केवल तप तप का उच्चारण करते रहिए आपको ज्ञान की प्राप्ति हो जाएगा। वही ब्रह्मा जी तप करने लगे। जिसके बाद आगे चलकर उनको सृष्टि करने का ज्ञान प्राप्त हुआ।
आगे सृष्टि में ब्रह्मा जी ने अपने सत्य संकल्प से सनक, सनंदन, सनातन, सनत कुमार को प्रकट किए। जन्म लेते ही यह लोग तपस्या करने के लिए निकल गए। ब्रह्मा जी ने कहा कि आप लोग सृष्टि का विस्तार कीजिए। लेकिन यह चारों लोग छोटे अवस्था में ही भगवान की तपस्या के लिए निकल गए। कुछ दूर आगे चलने के बाद भगवान नारायण से भेंट हुई। भगवान पूछे कि आप लोग कहां जा रहे हैं। वहीं पर यह चारों लोग कहते हैं कि हम लोग तपस्या साधना करने के लिए जा रहे हैं। वहीं पर भगवान श्रीमन नारायण इन लोगों को वरदान देते हैं कि आप लोग बराबर 6 वर्षों के बालक के रूप में ही रहेंगे।
चाहे आपका उम्र कितना भी बढ़ जाएगा, फिर भी आप लोगों का स्वरूप 6 वर्ष के बालक के जैसा ही रहेगा। भगवान के अवतार में भी इनका प्रथम अवतार माना जाता है।
आगे ब्रह्मा जी ने रूद्र को प्रकट किया, वहीं शंकर जी हुए। एक रुद्र से 12 रूद्र प्रकट हुए और 12 रुद्राणी प्रकट हुए। जो कि भगवान शंकर के 12 स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है। ब्रह्मा जी ने रुद्र से कहा कि आप सृष्टि का विस्तार कीजिए। वही शंकर जी सृष्टि के विस्तार में कई वैसे जीव जंतु पैदा कर दिए जो काफी विषैले हुए। ब्रह्मा जी ने कहा कि आपने तो ऐसे सृष्टि की रचना की जिसमें केवल विषैला जीव ही उत्पन्न हुए हैं आप रहने दीजिए।
ब्रह्मा जी के छाती से धर्म प्रकट हुए, पीठ से अधर्म पैदा हुए, पैखाना मार्ग से राक्षस पैदा हुए, लघुशंका मार्ग से नदी इत्यादि प्रकट हुए।
ब्रह्मा जी के द्वारा एक कन्या प्रकट हुई। जिनका नाम अहिल्या था। आगे चलकर के ब्रह्मा जी के द्वारा एक और कन्या प्रकट हुई, जिनका नाम सरस्वती था।
अग्नि आकाश वायु जल पृथ्वी इन पांच तत्वों का भी ब्रह्मा जी ने नारायण भगवान के आज्ञा एवं कृपा से प्रकट किया। जो ब्रह्मा जी के जन्म के बाद से तत्वों के रूप में प्रकट हुआ था।
आगे चलकर ब्रह्मा जी के सत्य संकल्प से 10 ऋषि प्रकट हुए। जिनका नाम इस प्रकार है। ऋषियों में मरीचि ऋषि, अत्रि ऋषि, अंगिरा ऋषि, पुलस्त्य ऋषि, कर्दम ऋषि, भृगु ऋषि, वशिष्ठ ऋषि, दक्ष, नारद, पुलह ऋषि इत्यादि। ब्रह्मा जी के छाया से कर्दम ऋषि का जन्म हुआ।
इतना सब कुछ होने के बाद भी सृष्टि विस्तार नहीं हो पा रहा था। ब्रह्मा जी के 10 ऋषि पुत्रों ने कहा पितामह आप अपने सत्य संकल्प से सृष्टि का विस्तार कीजिए। क्योंकि सरस्वती हम लोगों की बहन हैं। इसीलिए सृष्टि विस्तार की मर्यादा आपके सत्य संकल्प से होना चाहिए।
सृष्टि के समय भगवान नारायण ने पांच ज्ञानेंद्री पांच कर्मेंद्री एवं दुनिया में जितने भी प्रकार के वस्तु व्यवस्था प्रकृति मौजूद हैं, उन सब को नारायण ने प्रकट किया।
इतना कुछ करने के बाद भी अभी ब्रह्मा जी के मन में शांति नहीं हुई। क्योंकि सृष्टि का विस्तार पूर्ण रूप से नहीं हो पा रहा था। आगे चलकर ब्रह्मा जी के द्वारा लोभ, लालच, अहंकार, जीत, बुद्धि, ज्ञान, द्वेष, दम्भ इत्यादि प्रकट हुआ।
आगे चलकर ब्रह्मा जी के द्वारा देवता, पशु, पक्षी कई प्रकार के जीव को प्रकट किया गया। फिर भी ब्रह्मा जी के मन में शांति नहीं हुआ। वह भगवान श्रीमन नारायण का ध्यान करने लगे, कि कैसे सृष्टि का विस्तार किया जाए। वहीं आगे चलकर भगवान श्रीमन नारायण का मार्गदर्शन प्राप्त होता है। जिसके बाद वर्ष, महीना, दिन, नक्षत्र इत्यादि को प्रकट किए। उत्तरायण, दक्षिणायन, मुहूर्त, तिथि बहुत प्रकार के सृष्टि किया गया।
आगे चलकर ब्रह्मा जी ने अपने शरीर का त्याग किया और अपने शरीर को ही दो भागों में विभक्त कर लिए। एक पुरुष और एक स्त्री के रूप में हो गए। वहीं स्त्री और पुरुष मनु और शतरूपा के रूप में प्रकट हुए।
आज कुछ लोग मनु शतरूपा के इतिहास पर आपत्ती रखते हैं। उनको समझना चाहिए कि जो पहले इतिहास लिखा जा चुका है, उस पर किसी भी प्रकार का मतभेद या मनभेद रखने का औचित्य नहीं है। क्योंकि आज से 100 वर्ष पहले 1000 वर्ष पहले जो इतिहास लिखा गया या जो महापुरुष हुए उन्होंने कुछ अच्छा काम किया उनका आप गुणगान करते हैं और जो सृष्टि आज से 50 हजार करोड़ वर्ष पहले हुई, वह सृष्टि के जो सृजन कर्ता है। जिससे सृष्टि का विस्तार हुआ। वैसे मनु और शतरूपा के इतिहास पर भी मतभेद का कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि पूरा सृष्टि का विस्तार ब्रह्मा जी के शरीर जो दो भागों में विभक्त हुआ। वही मनु शतरूपा से ही यह आज पूरा संसार और सृष्टि का विस्तार हुआ है।
