
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)27 जुलाई।महान् संन्यासी दार्शनिक एवं संगठक धर्मसम्राट् स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज की 118 वीं जयंती पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् द्वारा फ्रेंड्स कॉलोनी कार्यालय में पूजन-अर्चन और टीचर्स कॉलोनी कतिरा में श्रीमद्भागवत कथा स्थल पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के अध्यक्ष और स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज के प्रशिष्य आचार्य डॉ भारतभूषण पाण्डेय ने कहा कि पूज्य स्वामी जी महाराज ने प्राणी मात्र के उत्कर्ष और विश्व कल्याण के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।वे महान दार्शनिक,महान संन्यासी और महान संगठक थे। परतंत्र भारत में अखिल भारतवर्षीय धर्मसंघ के आयोजनों,यज्ञानुष्ठानों तथा आन्दोलनों के माध्यम से राष्ट्र, धर्म और वैदिक संस्कृति का महाजागरण किया। लगभग उत्तर भारत में वैदिक यज्ञों का लोप होने लगा था और दक्षिण भारत में विद्वान् लोग सूखी सामग्री से यज्ञ की विधि की रक्षा कर रहे थे उस समय पूज्य स्वामी जी ने विशाल यज्ञों का आयोजन मुंबई, दिल्ली आदि प्रमुख केंद्रों पर करके वैदिक विरासत और उसकी दिव्यता से देशवासियों तथा अंग्रेजी सल्तनत को परिचित कराया। आचार्य ने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय और महात्मा गांधी ने रामराज्य की अवधारणा तथा रघुपति राघव राजाराम का उद्घोष पूज्य करपात्री स्वामी जी के प्रभाव से ही प्राप्त किया था। आचार्य ने कहा कि 14 अगस्त 1947को देश विभाजन का विरोध स्वामी जी ने तथा उनके अनुयायियों ने वायसराय के बंगले के बाहर प्रदर्शन कर किया था। गोवंश की रक्षा, वैदिक वर्णाश्रम सदाचार,मठ-मंदिरों की मर्यादा आदि के लिए पूज्य स्वामी जी तथा उनके नेतृत्व में रामराज्य परिषद् द्वारा किए गए आन्दोलन इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। रामराज्य और मार्क्सवाद जैसे कालजयी ग्रंथ के द्वारा समस्त पाश्चात्य मतों की अपूर्णता तथा अदूरदर्शिता का परिमार्जन किया और भारतीय मनीषा के प्रकाश से विश्व को अनुप्राणित किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रो बलिराज ठाकुर ने कहा कि अप्रतिम व्यक्तित्व त्याग और तपस्या की प्रतिमूर्ति तथा सरस्वती के वरदपुत्र थे स्वामी करपात्री जी महाराज जिनके द्वारा की गई धर्म और ब्रह्म की व्याख्या आज की पीढ़ी के लिए अत्यंत मननीय पाथेय तथा समस्त विश्व के लिए औषधि है। स्वागत भाषण डॉ चक्रपाणि मिश्र, संचालन मधेश्वर नाथ पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन सत्येन्द्र नारायण सिंह ने किया। स्वामी जी और भगवान शालग्राम का पूजन शिवदास सिंह, विजय गुप्ता,विश्वनाथ दूबे, रंगनाथ मिश्र, श्रीनारायण मिश्र, डॉ सच्चिदानंद मिश्र, नारायण प्रसाद,नूनू बाबू झा आदि ने किया।
