
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)25 जुलाई।सती संहिता की कथा करते हुए ब्रह्मपुरपीठाधीश्वर आचार्य धर्मेन्द्र जी महाराज ने कहा की दक्ष सुता सती से शंकरजी का विवाह संपन्नता के पश्चात कुछ दिन बीते,गृहस्थी चलने लगी।एक दिन बाबा के मन मे आया कि सत्संग छुट रहा है ।अतःसत्संग हेतु कुंभज महाराज के पास गये,संग सती जी भी गयीं।मतलब घर गृहस्थी धर्म निर्वाह करते हुए सत्संग भी करते रहना चाहिए।पतिधर्म है कि पत्नि को सत्संग भी प्रदान करें। सत्संग मे सती जी गई पर कथा मे मन नहीं लगा..कथा में जाइये तो तन के साथ मन भी रहना चाहिए, अन्यथा अनर्थ हो सकता है।आचार्य जी ने कहा कि मार्ग मे जिसकी कथा सुने रहे थे वे लीला वश सीता के लिए विलाप कर रहे थे..शंकरजी ने सब जानकर प्रणाम किया ,यह.जान सती को मोह हो गया।.. रामजी के ब्रम्हत्व पर सती ने संदेह किया..शंकरजी ने बहुत समझाने का प्रयास किया, पर नहीं मानी,तब उन्होंने कहा स्वयं परीक्षा ले लो.।.बस हो गया,लेने गयीं परीक्षा ,हो गयी इनकी परीक्षा.. शंकर भगवान ने मौका दिया ,पर सती जी ने झूठ बोल दिया…शंकर जी रम वैष्णव हैं ,बस बाबा ने त्याग कर दिया…. सती का… पिता के घर मे तन त्याग करना पड़ा, सती जी को…वहीं सती जी पार्वती के रुप मे हिमाचल सुता हुई और शिवप्रिया बनी।कार्तिक जी और गणेश जी पुत्र हुए, ऋद्धि सिद्धि बहुएँ और शुभ लाभ पौत्र हुए।.. ..इस कथा श्रवण का महात्म्य बताते हुए कहा कि “”
शंभू सहज समरथ भगवाना
यह विवाह सब कर कलयाना,
