
RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)22 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने भगवान श्री राम के चरित्र पर चर्चा किए। स्वामी जी ने कहा कि भगवान श्री राम की प्रशंसा उनके विरोधी भी करते थे। श्रीमद् भागवत कथा प्रसंग अंतर्गत स्वामी जी ने भगवान श्री राम को मर्यादा का पालन करने वाला बताया। भगवान श्री राम मर्यादा में इतने ज्यादा बंधे हुए थे कि उन्होंने अपने पिता, भाई, पत्नी तक को भी अपना नहीं समझा। भगवान श्री राम के लिए सारी प्रजा एक समान थी। उनमें न कोई अपना था न कोई पराया था। भगवान श्री राम इतने ज्यादा मर्यादा पूर्ण थे कि उन्होंने रावण से युद्ध करते हुए भी शत्रु के साथ भी मर्यादा के साथ युद्ध किया।
भगवान श्री राम और रावण के साथ जब युद्ध चल रहा था। उस समय श्री राम ने रावण को शस्त्र विहिन कर दिए थे। लगातार बाणों के प्रहार के कारण रावण पूरी तरीके से विचलित हो गया। उसके शस्त्र इत्यादि नष्ट हो गए। तब भगवान श्री राम ने रावण से कहा रावण अभी तुम शस्त्र विहिन हो, इसलिए हम तुम्हारे ऊपर अब बाण नहीं छोड़ेंगे। तुम जाओ थके हुए हो। जब स्वस्थ हो जाना तब आकर के युद्ध करना। भगवान श्री राम युद्ध में भी ईमानदारी रखते थे। शत्रु के साथ भी इस तरीके का व्यवहार करने वाला वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम थे।
स्वयं रावण ने इस बात को कहा था कि भगवान श्री राम युद्ध में भी मर्यादा का पालन करते हैं। इसलिए भगवान श्री राम को मर्यादा का अवतार भी कहा गया है। श्री राम इतनी ज्यादा मर्यादा पूर्ण थे कि उन्होंने प्रजा के कहने पर अपने पत्नी सीता को भी वनवास दे दिए थे। पिता दशरथ जी के कहने के बाद भी मर्यादा के कारण भगवान वनवास से लौटकर नहीं आए। जबकि दशरथ जी ने कहा था कि श्री राम यदि तुम वापस नहीं आए तो मेरा प्राण खत्म हो जाएगा। फिर भी भगवान श्री राम मर्यादा के कारण ही प्राण जाए पर वचन न जाए को पालन करते हुए 14 वर्षों तक वनवास रहे।
भगवान श्री राम ने यह प्रमाणित किया कि चाहे पिता हो माता हो भाई हो पत्नी हो या प्रजा हो मर्यादा सबके लिए समान है। किसी के लिए भी कोई मर्यादा में भेदभाव नहीं होगा। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की प्रशंसा उनके शत्रु भी करते थे।
भगवान श्री राम ईश्वर भी थे, राजा भी थे, प्रजा के रक्षक भी थे। रामावतार में भगवान ने इस पूरे संसार को जीवन जीने की मर्यादा को सिखाया है। राजा का आचरण कैसा होना चाहिए। यह भी भगवान श्री राम ने बताया है। राजा के लिए कोई अपना नहीं होता है राजा के लिए कोई पराया नहीं होता है। राजा के लिए धर्म, सिद्धांत, नीति, नियम ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। जो कि अपना हो या पराया हो, सबके लिए समान भाव से लागू होना चाहिए। वही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राजा हो सकता है।
मानव जीवन में मर्यादा ही सर्वोपरि है। यदि मानव जीवन में मर्यादा नहीं है तो व्यक्ति का व्यक्तित्व खतरे में है। इसीलिए इस जीवन में हम हमारा मेरा अपना यह सब थोड़े समय के लिए ही कारगर है। संपूर्ण मानव जीवन के कल्याण के लिए मर्यादा ही सर्वोपरि साधन है। इसीलिए हमें अपने जीवन में नीति, सिद्धांत, ईमानदारी, सदाचार, सद व्यवहार, मानवता के साथ ही जीवन जीना चाहिए। जिसकी मर्यादा हमें भगवान श्री राम ने त्रेता युग में अवतार लेकर हम मानवों को बताया है।
साधारण मानव भी भगवान के अशां अवतार को प्राप्त करता है
भगवान श्रीमन नारायण के मुख्य 24 अवतारों की कथा पर चर्चा करते हुए, स्वामी जी ने भगवान श्रीमन नारायण के तीसरे अवतार नारद जी के जन्म इत्यादि के बारे में विस्तार से चर्चा किए। नारद जी जो भगवान के तीसरे अवतार बताए गए हैं। उनका पहले जन्म में जन्म एक गंधर्व पुत्र के रूप में हुआ था। उस समय नारद जी एक सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे थे। लेकिन नारद जी के पुण्य कर्म के कारण ही भगवान के तीसरे अवतार के रूप में अवतरित हुए।
नारद जी दूसरे जन्म में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लिए। जहां पर नारद जी का जन्म हुआ था, उसी स्थान पर कुछ संत महात्माओं के द्वारा चतुर्मास्य व्रत अनुष्ठान करने के लिए आयोजन किया गया। जहां पर नारद जी और उनके माता ने संत महात्माओं का चार महीना तक सेवा किया।
जब 4 महीना का चातुर्मास्य व्रत समाप्त हो गया उसके बाद जब संत महात्मा ऋषि जाने लगे। तब नारद जी भी उनके पीछे पीछे जाने लगे। नारद जी ने कहा महात्मा जी आप मुझे भी साथ लेकर चलिए। हमें भी साधु बनान है। तब तक नारद जी की मां भी वहां पर पहुंच गई। नारद जी की मां रोने लगी। कहने लगी महात्मा जी मेरा एक ही पुत्र है। यह भी साधु बन जाएगा तो मेरा क्या होगा। इसे साधु मत बनाइए। उन महात्माओं के द्वारा नारद जी को समझाया गया। जिसके बाद नारद जी रुक गए। लेकिन नारद जी ने संत महात्माओं से कहा महात्मा जी हमें कोई आधार तो बता दीजिए। तब महात्मा जी एक मंत्र बताए। जिसका जप करने की सलाह दी गई।
वहीं नारद जी उन मंत्रों का जाप करने लगे। जाप करते-करते उनके मन में अपने माता की मृत्यु के प्रति भी बार-बार भावना आती रहती थी। एक दिन अचानक उनकी माता जी दुनिया छोड़कर चली गई। जिसके बाद नारद जी खुश भी हैं और दुखी भी हुए। दुखी इसलिए कि उनकी माता जी का मृत्यु हो गया। खुश इसलिए थे कि अब मुझे साधु बनने से कोई नहीं रोक सकता है। इस प्रकार से नारद जी अपने माता जी का पूरी विधि विधान के साथ संस्कार करने के बाद वन में चले गए।
जहां जाकर के महात्माओं के द्वारा दिए गए मंत्र का जाप करने लगे। वहीं पर भगवान के स्वरूप का छोटा दर्शन हुआ। जिसमें भगवान के स्वरूप देखकर नारद जी काफी प्रसन्न हुए। तब तक वह स्वरूप गायब हो गया। नारद जी मन ही मन सोचने लगे। आखिर इतना कम समय के लिए भगवान के स्वरूप का दर्शन हुआ, फिर से गायब हो गया, ऐसा क्यों। तभी आसमान से आकाशवाणी हुई।
नारद जी आपका पूजा पाठ तप इतना ही देर के लिए भगवान के छवि को दर्शन करने योग्य था। इसीलिए आप भगवान का जाप करते रहिए अगले जन्म में आप उस छवि को प्राप्त करने के अधिकारी होंगे। वही अचानक एक दिन नारद जी भी दुनिया छोड़कर चले गए। जिसके बाद तीसरे जन्म में नारद जी ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में जन्म लिए। वही भगवान श्रीमन नारायण के तीसरा अवतार नारद जी को बताया गया हैं।
