RKTV NEWS/अनिल सिंह,28 अप्रैल।मेरा दर्द न जाने कोय…..ये पंक्तियां शिक्षकों के आंतरिक पीड़ा को चरितार्थ करती हुई प्रतीत होती है। निजी विद्यालयों में शिक्षको के शोषण की बातें तो कही जाती है लेकिन राज्य सरकार भी इसमें पीछे नहीं है।शिक्षक जिसपर देश की पीढ़ी को शिक्षित कर संस्कारवान बनाने की आधारभूत जिम्मेवारियां तो पहले से ही है वरन इसके सरकारी जिम्मेवारियों का भी बोझ उनके कंधों पर डाल दिया गया है पूर्व से ही शिक्षकों को चुनावी ,जनगणना सरीखे कार्यों में सम्मिलित किया जा रहा है ऊपर से एक नई योजना जनगणना के कार्यों का भी अतिरिक्त बोझ इनके जिम्मेवार कंधो पर डाल दिया गया है हा ये और बात है की शिक्षकों के ईमानदारी और निष्पक्षता के लिहाज से ही इनको इतने बड़े कार्यों की जिम्मेदारियां सौंपी जाती हैं लेकिन सरकारों को भी इनके अंतर्मन की पीड़ा और कार्यों के बोझों को समझने की जरूरत है।इसी अंतर्मन की पीड़ा और जिम्मेवारियों के निर्वहन की गाथा गाती रचनाकार डॉ प्रतिभा पराशर की भोजपुरी रचना चलीं चलीं माहटर साहेब……
चलीं चलीं माहटर साहेब…..
चलीं- चलीं माहटर साहेब करे जनगणना।
पूछत चलीं घरवा दुआर अवरू अंगना ।। चलीं-चलीं….
भोरहीं इसकूल जाईं लइकन के पढ़ाईं।
भरल दुपहरिया में तऽ घरे-घर छिछिआईं।।
एसी राउर देह बा लूक नाहीं लागी ।
सुतल-बइठल लोगवा झटसेना जागी ।।।
कागज-कलम ले लीहीं लेइ लीं जी रंगना।
पूछत चलीं घरवा, दुआर अवरू अंगना।। चलीं – चलीं ..
भवन-मकान पूछीं, मुखिया के नावं जी।
केतना उमर बा, रहीले कवन ठांव जी।।
आपन रोजगार बा कि बाहरा कमाइले।
गाड़ी स्कूटर कि बाइक चलाइले ।।
फी-फी-फी -फी करऽताटे देखीं भरभीतना ।
चलीं-चलीं माहटर साहेब करे जनगणना।।
पूछत चलीं घरवा….
.कए काट्ठा खेत बा, केतना में घर बा।
सांचे-सांच बताईं , कथी के अब डर बा ।।
पढ़ल-लिखल बानी जवन सेहो लिखाईं।
कवन रउरा जाति बानी, खुलके बताईं।।
उछल-कूद करऽत बाटे गजब नन्हबीतना।
चलीं-चलीं…..
केतना कमाई महीनवा में होला।
हिटलर तऽ भर दीहें राउर अब झोला।।
नंबर आधार के झट से बताईं।
पूछीं परिवार से नत अब भुकाईं।।
आई चुनाव तऽ किनाई रउरा कंगना।
चलीं – चलीं माहटर साहेब करे …..
पूछत चलीं घरवा – दुआर……

चलीं चलीं माहटर साहेब…..