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क्रांति और समाजवाद के मसीहा थे मैक्सिम गोर्की।

RKTV NEWS/ प्रो डा जंग बहादुर पाण्डेय ,31 मार्च।रूस के महान समाजवादी लेखक और साहित्यकार मैक्सिम गोर्की का जन्म 28 मार्च 1868 को हुआ था। वे एक गरीब बढई परिवार से थे।
1884 में उनका परिचय मार्क्सवादी विचारधारा से हुआ और वे यहीं से क्रांतिकारी मार्क्सवादी लेखक बन गए। उन्होंने अपने देश की विस्तृत जानकारी करने के लिए 1891 में अपने देश रूस का विस्तृत दौरा किया और लोगों के जीवन के बारे में जानकारियां प्राप्त की। उस समय रूस की जनता का अधिकांश हिस्सा शोषण, जुल्म, अन्याय, अत्याचार, उत्पीड़न, गैर बराबरी और भेदभाव से पीड़ित था। इस सबका गोर्की और उनके लेखन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और यहीं से वे इन सब के खिलाफ लिखने लगे।
1892 में उन्होंने पहली कहानी लिखी, जिसका नाम था ,’चकर भद्रा’ था। उनका प्रथम सुप्रसिद्ध उपन्यास फोमा गोर्डेयेव 1899 में प्रकाशित हुआ।इसके प्रकाशन से उन्हें रातो-रात अद्भुत ख्याति प्राप्त हुई।तभी उनकी मुलाकात रूस के दो महान लेखकों चेखव और टॉलस्टॉय से हुई और वे उनकी बातों, उनके विचारों और लेखन से काफी प्रभावित हुए थे।
अपने सत्ता विरोधी लेखन के कारण उन्हें रूस के शासक जार द्वारा 1901 में गिरफ्तार कर लिया गया और काले पानी की सजा दी गई। 1905 में गोर्की की भेंट महान क्रांतिकारी नेता लेनिन से हुई और वे लेनिन के विचारों से बहुत प्रभावित होते चले गए और उनके क्रांतिकारी कारवां में शामिल हो गये। 1906 में गोर्की ने विश्व विख्यात उपन्यास “शत्रु” और “मां” जैसी कालजयी उपन्यासों की रचना की और जनता और मजदूरों को क्रांति का सपना दिखाया और उन्हें क्रांतिकारी विचारों से अवगत कराया।मैक्सिम गोर्की की अन्य विश्वविख्यात और क्रांतिकारी रचनाओं में शामिल हैं-1. सूरज के बच्चे, 2. तलछट, 3. मेरा बचपन, 4. लोगों के बीच, 5. मेरे विश्वविद्यालय, 6. सच्चे मनुष्यों की जीवनियां, 7. कवि का पुस्तकालय, 8. गैर जरूरी आदमी की जिंदगी, 9 पापों की स्वीकृति, 10. आखरी लोग आदि। अपनी क्रांतिकारी साहित्यिक रचनाओं और क्रांति के पक्के समर्थक होने के कारण मैक्सिम गोर्की को सोवियत लेखक संघ का अध्यक्ष भी चुना गया। हमारे देश के गोर्की मुंशी प्रेमचंद मैक्सिम गोर्की के बहुत बड़े प्रशंसक थे।

प्रो डा जंग बहादुर पाण्डेय

भारत की जनता अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रही थी,अंग्रेजी साम्राज्यवाद और उनकी लूट और गुलामी का विरोध कर रही थी, तो अंग्रेजों ने गोर्की के महान और कालजयी उपन्यास मां का पठन पाठन और उद्धरण को एक अपराध घोषित कर दिया था और भारत में मां उपन्यास को पढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था। जब प्रेमचंद ने अपनी 5 कहानियों का पहला संकलन “सोजे वतन” के नाम से प्रकाशित कराया तो देश में खलबली मच गई। इसमें देश-प्रेम और आजादी से संबंधित पांच कहानियां हैं। इसे पढ़ सुन कर अंग्रेजों के रोंगटे खड़े हो गये और सोजे वतन के संकलन को उन्होंने प्रतिबंधित ही नहीं किया अपितु उसे आग के हवाले कर दिया। लेकिन सोजे वतन के साथ प्रेमचंद की आत्मा नहीं जल सकी। बल्कि सोजे वतन के धनपत राय का रूपांतरण प्रेमचंद के रूप में हो गया।
हमारे निजी जीवन और विचारों पर सबसे पहले क्रांतिकारी प्रभाव मैक्सिम गोर्की के उपन्यास “मां” का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा था। इसे पढ़कर ही हम अपने जीवन के आरंभ से क्रांतिकारी समाजवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक हो गए थे और कालांतर में लोक मंगल वादी गोस्वामी तुलसीदास का परम भक्त हो गया।जहां तुलसी के राम यह उद्घोष करते हैं कि जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी रहती है,वह नरक का अधिकारी होता है।हमने सभी सदस्यों से तीन कृतियों को पढ़ने का अनुरोध सबसे किया है:-तुलसी कृत मानस, प्रेमचंद का गोदान और मैक्सिम गोर्की की मां।
सच में मैक्सिम गोर्की की रचनाओं ने बहुत सारे लोगों को क्रांतिकारी और क्रांतिकारी साहित्यकार बनाया है।दुनिया का मजदूर वर्ग गोर्की के लेखन से उनकी लेखनी की समाजवादी दिशा से कभी भी उऋण नहीं हो सकता। मैक्सिम गोर्की सच्चे अर्थों में क्रांति और समाजवाद के मसीहा थे।

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