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यह तो है मृत्यु लोक रे !

रचनाकार: धर्मदेव सिंह

यह तो है मृत्यु लोक रे

यह नहीं स्वर्ग लोक रे
यह तो है मृत्यु लोक रे
जो जो यहाँ आता
मर मर जाता रे।

जीने के लिए यहाँ
लाख करे कोई कामना
लाख करे कोई दुआ
बच नहीं कोई पाता रे
यह तो है मृत्यु लोक रे ।

दिन रैन यहाँ
जानेवालों की
रेलवे टिकट काउंटर सम
लगी रहती
कतार लम्बी रे
क्योंकि यह स्वर्ग लोक नहीं
यह तो है मृत्यु लोक रे।

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