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जनसंघ के इतिहास को समझे बिना समकालीन भारतीय राजनीति को समझना मुश्किल: प्रो. के. जी. सुरेश

नई दिल्ली/डॉ एम रहमतुल्लाह 29 अगस्त।केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय, संस्कृति मंत्रालय, शास्त्री भवन नई दिल्ली की ओर से को अपने आउटरीच कार्यक्रम के तहत पुस्तक लोकार्पण एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कौशिकी दासगुप्ता की चर्चित पुस्तक ‘Electoral Politics and Hindu Nationalism in India: The Bharatiya Jana Sangh, 1951–1971’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक का प्रकाशन Routledge, UK ने किया है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. के. जी. सुरेश, निदेशक, इंडिया हैबिटेट सेंटर तथा पूर्व कुलपति, ने भारतीय जनसंघ के इतिहास के अध्ययन को समकालीन भारतीय राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनसंघ, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राजनीतिक विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बना, उसके गठन, विस्तार और राजनीतिक चुनौतियों का अध्ययन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को समझने में विशेष मदद करता है।

प्रो. सुरेश ने प्रो. कौशिकी दासगुप्ता को इस विषय पर व्यापक अकादमिक शोध के लिए बधाई दी और कहा कि पुस्तक जनसंघ के प्रारंभिक इतिहास तथा उसके राजनीतिक विकास के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर विमर्श का अवसर प्रदान करती है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. सुधीर सिंह, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने जनसंघ के इतिहास की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान और राजनीतिक संघर्षों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय राजनीति के विकासक्रम को समझने के लिए उस दौर के राजनीतिक आंदोलनों और नेतृत्व का वस्तुनिष्ठ अध्ययन आवश्यक है।

पुस्तक की लेखिका प्रो. कौशिकी दासगुप्ता ने भारतीय जनसंघ की स्थापना और उसके शुरुआती विकास पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने विशेष रूप से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका और जनसंघ के शुरुआती राजनीतिक विस्तार को रेखांकित किया। उन्होंने पुस्तक लेखन के दौरान अपनी अकादमिक यात्रा और शोध से जुड़े प्रमुख सवालों को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि पुस्तक के माध्यम से उन्होंने भारतीय चुनावी राजनीति और हिंदू राष्ट्रवाद के विकास को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया है।

केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय के निदेशक डॉ. अजीत कुमार ने पुस्तक के केंद्रीय विषय और उसकी विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पुस्तक भारतीय राजनीति के उस अपेक्षाकृत कम चर्चित इतिहास की ओर ध्यान आकर्षित करती है, जिसमें कई राजनीतिक नेताओं और उनके योगदान ने आगे चलकर देश के राजनीतिक विकास को प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे अकादमिक कार्य नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं को भारतीय राजनीति के ऐतिहासिक स्रोतों और राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझने में मदद करते हैं।

पुस्तक पर आयोजित परिचर्चा में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की प्रो. भारती शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. मनीष कर्मवार, अधिवक्ता पीयूष पुष्कर सहित अन्य शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विषय विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों ने पुस्तक में उठाए गए विभिन्न ऐतिहासिक और राजनीतिक सवालों पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में दिल्ली के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए प्रोफेसरों, शोधार्थियों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया। परिचर्चा के दौरान दर्शकों ने पुस्तक के विषय, जनसंघ के राजनीतिक विकास, चुनावी राजनीति, हिंदू राष्ट्रवाद तथा समकालीन भारतीय राजनीति से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सवाल पूछे। प्रश्नोत्तर सत्र में हुई सक्रिय भागीदारी ने कार्यक्रम को एक सार्थक और विचारोत्तेजक अकादमिक विमर्श में बदल दिया।

कार्यक्रम का उद्देश्य पुस्तक के माध्यम से भारतीय राजनीतिक इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों पर अकादमिक संवाद को बढ़ावा देना और शोधकर्ताओं तथा पाठकों को भारतीय राजनीति के विकासक्रम को ऐतिहासिक दृष्टि से समझने का अवसर प्रदान करना था।

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