
RKTV NEWS/आजमगढ़(उत्तर प्रदेश)03 अगस्त।हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयागराज, महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के डीएवी पीजी कॉलेज, आजमगढ़ तथा नया परिमल के संयुक्त तत्त्वावधान में स्वर्गीय डॉ. कन्हैया सिंह की जयंती पर आयोजित विचार सत्र में “हिन्दी सूफी काव्य और सांस्कृतिक समन्वय” विषय पर गंभीर अकादमिक विमर्श हुआ। विचार~ सत्र कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में नव नालंदा महाविहार , नालंदा के डीन, पालि एवं अन्य भाषा संकाय तथा हिन्दी विभाग के प्रोफेसर डॉ. रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” ने व्याख्यान दिया।
अपने वक्तव्य में परिचय दास ने कहा कि हिन्दी सूफी काव्य को अब केवल प्रेमाख्यानक काव्य के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। इसकी समकालीन व्याख्या आलोचना की अवधारणाओं, विशेषकर सांस्कृतिक अध्ययन, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श और अंतर्पाठीयता के आलोक में की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे सूफी साहित्य के नए अर्थ और सांस्कृतिक आयाम उद्घाटित होते हैं।
उन्होंने कहा कि सूफी काव्य मूलतः “दूरी का साहित्य” है, जिसमें विरह, खोज और आत्मान्वेषण की प्रक्रिया केंद्रीय है। जायसी, मंझन और अन्य सूफी कवियों के यहां प्रेम केवल लौकिक नहीं, बल्कि आत्मा और सत्य के मिलन का सांकेतिक आख्यान है। परिचय दास ने कहा कि सूफी काव्य को केवल आध्यात्मिक अनुभव या रहस्यवाद तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति, लोकजीवन और मानवीय संवेदनाओं का भी महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि पद्मावत सहित अन्य सूफी प्रेमाख्यानों में इतिहास, मिथक, लोकविश्वास और प्रतीकों का ऐसा अंतर्संबंध है, जिसे आधुनिक आलोचना की दृष्टि से पुनर्पाठ की आवश्यकता है। उनके अनुसार आज के समय में जब सांस्कृतिक असहिष्णुता और पहचान का संकट गहरा रहा है, तब सूफी साहित्य संवाद, सह-अस्तित्व, करुणा और सांस्कृतिक समन्वय की सबसे सशक्त मानवीय आवाज़ बनकर सामने आता है। इसलिए नई पीढ़ी को सूफी साहित्य को केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की वैचारिक आवश्यकता के रूप में पढ़ना चाहिए।

परिचय दास ने कहा कि भारतीय समाज की बहुलतावादी चेतना का प्रतिनिधि यह साहित्य लोकभाषा, लोकसंस्कृति, विभिन्न धार्मिक परंपराओं और मानवीय मूल्यों का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय आलोचना को पश्चिमी सिद्धांतों का अनुकरण मात्र नहीं करना चाहिए बल्कि भारतीय काव्य-परंपरा के साथ उनका रचनात्मक संवाद स्थापित करना चाहिए। तभी सूफी साहित्य की व्यापक सांस्कृतिक और मानवीय शक्ति का समुचित मूल्यांकन संभव होगा।
कार्यक्रम के विचार सत्र में महनीय उपस्थिति थी : प्रो. निर्मला एस. मौर्य ( अध्यक्ष ), पूर्व कुलपति, पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर; प्रो. गीता सिंह, अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, डीएवी पीजी कॉलेज, आजमगढ़; डॉ. सुजीत कुमार सिंह, डॉ. विपुल तथा डॉ. निरंजन यादव। संचालन डॉ. अवनीश राय ने किया। कार्यक्रम के अन्य सूत्रधार एवं सहयोगी थे : प्रो. अखिलेश चन्द्र, प्रोफेसर, शिक्षाशास्त्र, श्री गांधी पीजी कॉलेज, मालटारी, आजमगढ़ तथा डॉ. विनम्रसेन सिंह, हिंदी प्राध्यापक, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, प्रयागराज। इसमें डॉ. कन्हैया सिंह के शिष्य श्री राजेंद्र लाल जी जो, 1960 में बी.ए. में उनके हिंदी के शिष्य थे, भी उपस्थित थे।
