फिर भिडंत काहे(एक)
बीतल बात के याद करत चिन्ता में मत मारऽ डुबकी,
नीक जबुन जे भइल, भइल, अब मत मारऽ सिसकी।
भाई भतीजा, मामा-नाना, गुरू के खून मत देखऽ अब,
आन्हर कुरकुट ठेंगुराइल बुढ़वा के प्रपंच मत देखऽ अब।
हो गइल केश बगुला अस बग बग, दिल बा जेकर करिया,
लड़का ना एको दिन अपने, बाकिर कटववलख दुनिया।
इतमिनान से सोच रहल बा, खून के नदी बहल त का?
मिट ना पावल ईज्जत माटी में, ढेरे कटइलन त का?
चढ्लन जवान सब होम, विधवा त एक-एक बाँचल बाड़ी,
भभकत रहो देश के चेहरा, कोंखी के लाल चढ़वले बाड़ी।
लिहीं नाम विधवन के, देश खातिर सेनुर लूटवले बाड़ी।
पता ना एही दिन खातिर, ई लमहर जिनगी पवले बाड़ी।
महाभारत के बचल क्षत्राणी घरे बइठ के बिलपत रहली,
मेवाड़ के वीरगंना चिता चढ़ अजबे जौहर देखवले रहली।
दइबे जानस देश लाज में कवना में कलन मतलब बा छीपल,
कि खाली बा नकली रूप ओढ़नी से राखल बा ढाँपल।
विष के कपटी आग जलावत, कतना दिन से चलल बा आवत,
लुरगर खातिर मुकुटधारी, स्वारथी, भूक्खड़ बा लागत।
दुनिया के एके नजर से देखेवाला, अइसन कठ करेज ना होला,
केहूना चाहे लड़ल, अहंकार के जहर के लहर अपने फैलेला।
खीस जब उमड़ी कबो गरमाई, ठंढाई, मन दोहपच में पड़ी,
बढ़ी जोर गरमइला से त, आँख मूँद लड़े पर पड़ी।
का जीतलन? पुरखा पुरान, नीरस उदासल अँखियन लोर ढ़रकावत बा, लड़ लिही, जीतियो जाई पायी समर बीच साँच माथ पकड़ले रोवत बा।
का साँचे वीर लड्वइया सब काटल गइलन? जानते सदमा से लागे काँपे, बेसुरा जीत के बाँसूरी सुन, रोवाँ गनगना के लागे काँपे।
कलेजा चूर भइल अचके, साँच हताइल, एकर कवन निवारण बा,
ना मिल रहल बा जबाब, कलेजा से टकरा इहे अवाज लौटत बा।
लागी काँपे पैर, खड़ा ना होवे पइहें, भरभरात धरती के धरिहें,
अइसन गॉहिड़ार घाव के जानत बा, एको जवाब नइखे।
काहे कइलीं वीर विहीन, खून के नदी वहवलीं,जानत होखऽ त बोलऽ भगवान,
लाग रहल बा आदमी आदमी के बनल बा, पत्थर के बस प्राण।
समर के विषैला घाव ना भरल, पीड़ा से मन बडुवे डोलल,
मारत, मरत जीतलो पर रोवत, बाकिर रथ लेले फिर दौड़ल।
रंग रंग के रथ लेले हर लोग, बडुवे धरती के छाती चीरत,
स्वाभिमान रथ, न्याय रथ, गरीब चेतना रथ, भंडा फोर रथ लेले बा घूमत।
एक चलल पूजा घर ओर, एक कवच बन साथ बा धइले,
एक मसानजोर देखा डरवावत, एक बा घपला के नाम गिनवले।
एक बाँटल त्रिशूल सदेहे, दोसर तेल पिआवल लाठी सबके,
नीक थूरात बा मुड़ी प्रजातंत्र के, कवन कलंकी ना वाड़न अबके।
हवा भइल सब रोटी इहवाँ, स्वर्णीम सड़क के सपना बा साजत,
जतले रहऽ आँत सूखलहीं, आइब देखे ठठरी, अम्पाला दौड़ावत।
प्रजा जाय भले भाड़ में, अपराधीन ले राज सिंहासन हथिआइब,
हीक भर माल खजाना लूटव, तोहरा खातिर भूठहूँ लोर ढरकाइब।
बात अहमदाबाद के छोड़त, गोवा में दोसरे बोलब,
जा लाहौर में कहब कलंक, हम आमेजन तट जा मुँह खोलब।
जिन्ना के जीन अजब रखेदलख, का से का ना भइल,
भारत उदय भा निर्माण के बात भूलाइल, चेहरा पर फेफरी पड़ गइल।
ट्रैक्टर, हार्वेस्टर लाकर के, जोड़ा बैल बेलावल गइल, गाय बछरूवा खूँटा तुड़लख, बस हाथ साथे रह गईल ।
वाहे गुरु, सत श्री अकाल, सीमा प्रहरी सुत भइलें बदहाल,
ई चौरासी आसन ना, चौरासी रहे हाथन के कमाल ।
ढरत लोर अँखवे सूख गइल, नीरो के वंसी बजत रहल,
साबरमति तट पंचनद तट भइल, आस्था, यर्थाथ बीच बात फंसल।
के उनईस बा, के बा बीस, जन के ना बा तनिको बुझात,
दूनहो जोर लगवले बा, घात कइला से ना बा अघात।
बोले, हम चौरासी पर माफी माँगबऽ, तू गुजरात पर रहबऽ माँछ अइंठले,
चून चून लेब फरीयाय जन समर में, का बाड़ऽ कुछ कम समझले।
सौ पुत्रन के श्राद्ध हो रलबा कुरूक्षेत्र में एक साथ में,
बुढ़ा बाप रो रहल बा आज चिता के समाने में।
एक बूढ़ा ब्रह्मचारी बाण टंगाइल, देख रहल आकाश मुँह बवले, मेहरी दाव चढ़ावेवाला जुआड़ी धर्मराज रो रहल पास मुँह ढपले।
पार घाट केहू एके उतरल, बाकी छूटलन ओहपार झमेला में,
केहू हारल भा जीतल, कुछ ना मिलल जनता के छोड़ छीलकोवा निकाले के।
लट पंचाली के खुलल लट खींच घसीटेवाला के खून त खुलले रह गइल, से जब ना धोवल गइल।
तेरह साल तक खुलल रहल खीसी अगिअइले,
प्रण पूरा भइल पापी के खून से जात नहइले।
द्रुपद सुता के पाँच अबोध पुत्रन के कइलन वध सुतला में,
दंभी गुरु पुत्र अश्वथामा कइलें रहन पितृ शोक में;
कुन्ती पुत्र भीम चढ़ छाती, मणी मस्तक आज निकललन,
पुत्रन के बदला में देलन मणी, पंचाली हाथन में।
अंध पिता धृतराष्ट्र छोड़, केहू ना बाँचल सामने में,
अंधी, सत्ता मद-अंध अन्धा, सिर धुन रहल बस सामने में।
आनन्द के उद्वेग में आवाज पांडव के शिविर से,
उठ रहल बा जीत के आवाज कुरुक्षेत्र के श्मशान से।
बाँचल ना दुश्मन जे सुनो अतहत कोलाहल जीत के,
लड़खड़ा के पवन बेग से लौट रहल सब शब्द गीत के।
मरघट गाभी मार रहल बा, के बा जीत के सेहरा बन्हले,
जीतलऽ त, केकरा पर करबऽ राज, एको बैरी वीर ना बॅचले।
जादे खुश फहम मत बनऽ, ना केहू जीत के डंका सुने वाला बा।
जीत के नशा में मत डूबऽ, जुआड़ी के जिनगी भार होवे वाला बा। चौरस पर के एक जुआड़ी बा बीचे गुम-सुम लगवले,
बोल ना बहुवे पावत, पड़ल सोच में, ढेरे लोर ढरकवले।
सोच रहल बा जे चल गइल एह कलह से, ऊहे नीक,
ना सुनीहन जे आगे गइलन, आपन आनन्द ना बहुवे ठीक।
कहाँ नींद बा आवत, सपना में सुयोधन बार बार दुहरावत बा, मेहरी के दाव चढ़ावे वाला! दूर बहुत दूर, हमार पाँव जमल बा।
मत खिलखिला जीत पर जादे, ना केहू देख रहल बा, ना सुन रहल बा, चिढ़ा पइब ऽना हँस हँस के, खूदे तोहरे चेहरा बिगड़ रहल बा।
देख रहल बानी महाभारत बाद सबकुछ बडुवे खाली-खाली, भइल, कइसे भइल ना चढ़ रहल सुरता, रहे कहाँ जड़ कहाँ डाली।
कहे सुयोधन हम अइलीं एह पार, तू छूटलऽ ओह पार झमेला में, भइल हार केकर, के जीतल, अबहीं बाड़ऽ तू छीलकोवा निकाले में।
मारत रहऽ ठसका, जारत रहऽ दिल आपन पछता के,
करत रहऽ उपहास, भोगत रहऽ राज, भाईन पर दाब चला के।
सुन रहल बानी, एक जुआड़ी सुनते, आप ठठाइल अपना से, काटत मुस्की सुनसान मरघट में, सब देख रहल अपना से।
ई कइसन बा हाल भइल, ना कवनो जवाब बा मिलत,
विरोध में काहे ना केहू अब बा हड़ाहोड़ मचावत।
केकरा पर अब ऐंठ दिखलाइब, केकरा पर शान दिखलाइब,
केकरा पर हुकुम चलाइब, मुकुट पेन्ह केकरा पास झमकाइब।
नभ में ना बा कवनो गरजन, धरती खून सनाइल बाड़ी,
भइल भिडंत कइसन, बस सड़ल लाश बजबजात बा खाली।
पता ना अब का बाँचल, किस्मत के कनखी मारल देखत बानी,
रण से काम मधुर ना भइल, नमकीन खून बा फैलल खाली।
दुश्मन रहतन गिड़गिड़ात सोझा में, ईच्छा कहाँ पूरा भइल?
जीत से कुछुवो ना मिलल, अरमाने सब हवा भइल।
टूटल रथ हाथी घोड़न साथे, जहँ तहँ नर मुंड छीतराइल बा,
कुछ विधवा, एक अंधा-अंधी, नादान भाई सब बाँच गइल।
जेकरा के बस में दबले राखे के, आपन मन बनइले रहीं,
ना पकड़ाइल हमरा से फुर्र से उड़ गइल आसमान,
ऊहे हँसी उड़ावत बा, रहऽ इतमिनान से अब पछतात।
अइसन महाभारत हमरा कवनो काम ना आइल,
दिल जलत बा झूठहूं के, कि ई का कुछुवो भइल।
सारा दुनिया जाय भाड़ में, पर आपन मोंछ ना झुके पावे,
बिछल रहे कंकाल धरती पर, तब अभिमान का नीक कहावे?
ई पाँचन के अहंकार जब जागल ना रहित, रहित दबाइल,
बढ़ल रहित भल ऊहे, शांति रहित, ना रहित थोक भाव में लोग कटाइल।
अब पेन्हऽ झमकावऽ चकुनी-हाथी द्रौपदी सिल्कन साड़ी,
रह ना सकलु नंगा क्षण एक, अहम् में नाश भइल दुनिया सारी।
आपन लाज बचावे खातिर ढेरकन माँग धोववलु,
हता गइलन कोंख के लाल, उत्तरा तक से घर में छाती पिटववलु।
कोटिन माँ-बहनन के उजड़ गइल सिन्दुर तोहरा खातिर,
का भोगीं, कइसे काटीं दिन, खून से लथपथ लेके दुनिया तोहरा खातिर।
एह में कुल वंश के खून फेंटाइल बा, अभिमन्यु के खून सनाइल बा, गुरु के खून एही में, मामा के एही में, ना आपन अन्हकर हिगराइल बा।
दिल पिघल पिघल बा जात, चहलो पर पथराते नइखो,
उलटे पाथर के ढोका बा दिल दबले, चहलो पर दूर फेंकाते नइखे।
अकिल हेराइल बा, कुछ ना सूझ रहल बा,
मरघट के राख में खोजत असली चीज भूलाइल बा।
दुख, बस खाली दुख नस नस में फैलल बा,
ठंढ़ा भइल बा जोश, ना तनिको उफान उठल बा।
बा आह बस आवत हर पल हर साँसन में,
फेंकऽ गाण्डीव, गदा, भाला, तलवार, जा रहल बानी पितामह पास में।
विजय के पिटल पिटारी तनिको सुहात नइखो,
खुशी के जयकारी तक तनिको सुनात नइखे ।
आलीशान गुम्बद गिरल, कइसे गिरल बुझात नइखो,
पंचनद आइल कहवाँ से, कि सरयु तीर चिन्हात नइखे ।
सांझे गाँधी गिरलन मंदिर में, साबरमति भूलाते नइखे,
सूरत के सुरत का बिगड़ल, नीरो के रूप भूलाते नइखे ।
जइसन भी होवे वंशी बाजत, हे राम, छोड़ दोसर सुनाते नइखे,
वर्धा ह की नोआखाली बोलऽ बापू, अंधकार छँटते नइखे ।


