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संकल्प

संकल्प

कवन फसल के बीआ डलली, ना इहो हम जनलीं,
सपना के भारत के चेहरा, बिन जनले हम ढोवलीं।

हम एगो बात सदा जनलीं, धरती हउवी बहुते उदार,
पटवल जियका खातिर जन से लेली माटी जल थोर उधार।

ना बेकार जाला कबहुं, बा ईहो दान रे बहुत खूब,
नाहींयो देली तबहींयो बदले देली हरियर दूब।

ना पानी से खाली, अपना गरम खून से पटवले बानी,
जुल-जूल तन ना, चढ़त जवानी, आपन यार चढ़वले बानी।

का अइसन बलिदान अजब ई निपट पचा ऊ पइहें?
काहे ना हमरा भारत के उन्नत राष्ट्र बनइहें।

अइसन अनुचित ना होई कि कटल पेड़ के टहनी मेंटी,
जगल देश अपने बलबूते, आपन निखरल शक्ति समेटीं।

ईर्ष्या, द्वेष, कपट जबले ना, भीतर से सब भागी,
भारत के चेहरा तबतक ना, तनिको सुघर लागी।

आपन भारत के आत्मा के जबले पीर ना जाई,
तबले ना कवनो नर-नारी, नीके सूते पाई।

बीचे राह थथम समइयो शायद कुछ सोच रहल बा,
अचके में इतिहास डेराइल, संकोचे बस ठहरल बा।

सैकड़न साल के लगल समाधी, भोला के बा डोलल,
खूलल तोप के मुँह आज, भावी भारत बा बोलल।

मारत रहीं हथौड़ा हरदम, पत्थर, चूर-चूर हो जाई,
लगले नयका फूटी एकधारा, भारत में नव विहान हो जाई।

पड़त निरंतर रही चोट, तब धूरकुस हो जइहें पखान,
फिर गरम कुंड से निकली धार, मारते गोता, भारत के मिटीहें थकान।

महानाश के बेला में यदि मनचित लाई विचारी हम,
तब घरघरात रथवे अस, अनुगूँज सुनाई देबे हरदम।

जवन चीज पावे खातिर, बा घबराईल सभ लोग लगल,
ओही परतापी वीर धीर ला, बा कठोर ई युद्ध ठनल।

जवन क्रोध अम्बर में निकसत, गरदा गजपद चापित बा,
उहे फाड़ पाथर के छाती, अंगारो बरसावत बा।

हो कतनों विपरीत हाल पर, ई कबहुँ बेकार ना जाई,
बड़-बड़ वीर बिहड़ योद्धा सब, आ लगले सोझे छतिआई।

अइसन नर के चेहरा होले चमकत धधकत अंगार नियर,
शिव-विष्णु के अंश संजोवले होले सदेह भगवान नियर।

जे पापी, नरकी, दुष्टन से ना कबहूँ गंठजोड़ करे ला,
बड़ा काम खातिर ऊहे नर, समय पर हथियार धरेला।

व्याकुल लोगन के कराह ई, रात के दिन कर जाले,
उहे नर पुंगव समाज में, हरदम पूजल जालें।

न्याय ना जिनका मिल पावल, तिनका खातिर ऊ हउवे आशा, दीनहीन निरधन गरीब के, हवें ऊ चाहत अभिलाषा।

जिनका विचार में बिजली अस तेजी होले, ऊहे चमकेला,
जे समाज खातिर गरजेलें दुनिया ओकरे नाम जपेला।

ओही वीर जवाँ के देखऽ, रथ दउड़त बा आवत,
नीचतई, पशुता, निरदयता पर, बा पावक बरसावत।

कवि कोविद सब मिल के गावऽ जयकारी के तान सुनावऽ,
वीर देवता आवत बा अब, स्वागत में सब पलक बिछावऽ।

एक हाथ में फरसा, अपर में जल से भरल कमंडल,
भाग्य पुरुष आवत भारत के, हम आज मनाई मंगल।

हार लाल अंगार बरोबर, पहनाईं हम आजे,
लाल-लाल अंगार नयन लखि, ना डरे के कमसे हदस ढ़पाये।

दुश्मन के हउवन दुश्मन ऊ, हमनी के पुण्य बढ़ा देलन,
फिर जे बडुवे भयभीत इहाँ, ऊ उनकर हदस मिटा देलन।

कड़ियल खातिर बढ़ के कड़ियल, किरपिन खातिर बड़का किरपिन,
हमरा तोहरा खातिर आपन, उनका से बढ़ के बा के फिन ?
परे जाति जुमला से बिल्कुल, गोत्र वंश सबसे फिर ऊपर,
राग द्वेष के लेश ना मन में, लागे बम भोले शिव शंकर ।

गजब तेज लेले अँखियन में, सचमुच आवत बाड़े,
कटल देश के धारा से जन के जोडत आवत बाडे।

साधु-सन्त मत तनिको डरस, ना मान मुकुट ई मंगिहें,
सूतलो रहबऽ निरभेद नींद में ऋषि अस पहरा दिहें
कहीं ठनल गर युद्ध त जमके लोहा लीहें, गोला दगीहें।

लोगन मान-सम्मान, गौरव पर, चोट कबो जे बाजी,
तब तेज आग के लपट नियर, अपने आप फैले लागी।

ई हउवे घायल विषधर के आग नियर धधकत अंगार।

ओइसने आहत निज देश के, ई अजमाईश हउवे बरिआर,
भरल जोश के माटी ई विजयी अर्जुन बा आवत,
भा त्रेता के परशुराम बा फेर उठावत।

गुस्सा में बउखल उखमंजल, आपन जोर महारत ह,
ई ना हउवे कुछ अउर, बस आपन निरमल भारत ह।

ध्वंस बदे जोरगर अपने अब तरकश से शर छूटी,
कायरता के धरम धूध पर, बाज नियर ई टूटी।

तिजुकल अस्त्र-शस्त्र वालन के माटी मजिगर कोड़ी,
जलिहा चमकत राजपाठ के भसम बना के छोड़ी।

ई मलेच्छ के नाग-पाश के, निश्चय जबरन काटी,
मुंड गिरा दुश्मन के दन-दन, खाई खण्डक पाटी।

डर, भय, खटका के एकबरगी, चाट लपालप जीभ से जाई,
आउर सराहत हमनी सभ के, आपन जानी अस अपनाई।

बस खाली ऊ ज्ञान कराके ना तनिको चुपचाप बइठिहें,
गगन छोर पर सतरंगी, ऊ इन्द्र धनुष दिखलइहें।

सधल निशाना बा जहवाँ ले, उहवाँ तक ऊहे पहुँचइहें,
लड़का जान धरावत अंगुरी, मंजिल तक ले जइहें।

भय से धक-धक करी कलेजा, घन बटोर पानी बरसइहें,
बीतल दुर्दशा होनी के बीचे, निस दिन काम बजइहें।

मुरझाइल धन खेती पर, झम-‘झम नीक बरसात करइहें,
होखी राहे कवनो चट्टान, बिजली अस बन बम भहरइहें।

मिट जइहें दोहपच कुल्हिये, जब ई समाज सब जूझी,
अम्बर भी अवनी के निकहा, अंकवारी भर चूमी।

मजहब, ईमान ना कबहूँ, नीति नियम विज्ञान से अलग रहीहैं,
सब गरिमा गौरव पहिले अस, फिर अब आज धधइहें।

आवते उनका दुष्ट मुर्खता-बेवकुफी के छोड़ीहें,
कतनो विषधर रहस साँप, आपन फण अपने से तोड़ीहें।

कतनो घहरी विष के बादल, गाँधी के तोपे ना पाई,
शाँति के झोपड़ में एको, ई गोला दागे ना जाई।

रही कदम गरमाइल, बाकी बूझ-सूझ उठावल जाई,
जन-मन में होई हरियाली, दुश्मन फिर ना उठे पाई।

रचनाकार: डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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