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परशुराम के कुटिया (रश्मि रथी का भोजपुरी अनुवादित अंश)

परशुराम के कुटिया (रश्मि रथी का भोजपुरी अनुवादित अंश)

दूर-दूर तक सुंदर, एगो वन रहे पहाड़ के उपर, पसीनाइल अंकवारी में कुटिया के लले, झरना झरत रहे ओह उपर।

पर्वत पर्वत पर भी समतल, सुंदर धरती फैलल, पत्थर त दिखत ना रहे, एगो झोपड़ी ओहि हरियाली के बीचे, बस उपर में जमल रहे।

सटले में काटल धन खेत, ओढ़ले पीअर ओढ़नी मुस्काते रहे, कुद-कुद के चावल के कण, रूसी, खरहा, मुस, कबूतर खाते रहे।

खाके अउघाइल, अलसाइल, कुछ बचवन खातीर भी राखत रहे, पूजा के शाकल्य ढेर में मुँह लगवले गाय बछरवा मातल रहे।

बुतल रहे आग हवन के, हवा बाकीर महके से मातल रहे, मीठ महक, अबहूँ नीशिआइल हिरदा के हर्षावत रहे।

हरियर पत्तई पेड़न के, हवन के धुँआ से धूप में अइसन लागे, काजल आँख लगावल लइका, अलसाइल, झपकाइल लागे।

मिरगा धामा बइठल पागुर बड़ा मजे में उँहवा करे, वन के जीव बिल से बहरी, बड़ी शांति से घूमे निडरे ।

ऋघि नहान के फीचल भगही, आम डाल पर सुखत रहे, खूब मुलायम चिकन पत्थर, जहाँ-तहाँ बिखराइल रहे।

कुश, पलाश, कमंडल, तलवार, सभे भयावन टांगल रहे। चमकत फरसा एगो, कुटिया के दुअरा पर लउकत रहे,
पड़ल रहे लोहा के लाठी, ओह में आधा रवि बइठावल रहे।

मृगाछाल पर कुश बिछावल मन के भावल,

फरसा देख मगर मन में, डर वा केहू घुसावल । समर भूमि या तप भूमि, तनिको समझ ना आइल,

जेकर हवन-कुण्ड, धनुषवाण भी उनके, सोच भरमाइल।

घी ढारी करछुल जेह मुनी के, होइहें तलवार भी, मान ना भइल, बड़ा सोच में पड़ल जीव, काह साच, ना झूठ बुझाइल।

का आइल वा वीर इहा तपवन में, पुण्य कमाये खातीर, या सन्यासी साध रहल बा योग, भुजवल बढवे के खातीर।

सफल होई का देह पका के, कि पायी खड़गे तलवार, कि कवनो योगी से सीखे, आइल वीर इहवा एक बार।

तप में तपल, पास में परशु, इहे वीर के शोभा देला, नाहीं नपुंसक से तप होला, नाहीं तलवार भी हाथ में होला।

कवन पुरूष तपलीन बा इहँवा, जे रखले बा धेनुहा-बाण, एक साथ में हवन भी करे, लउकत होखे तलवार के तान।

एक पुरूष इतिहास में रहलन, रण में टेढ़, रोष से भरल, काल बरोबर, तेजी जप बल में, सुरज के तेजी भी छोटा परल।

मुँह वेद के ऋचा, पीठ पर तीर भरल चोंगा के बन्हले; कड़कड़ात तलवार चमाचम, आपन हाथ में धइले।

संशय में शाप, हाथ में धेनुहा, एह मुनी के बल साथे में अइलें।

कवन-कवन ना गुण ऋषीवर के पासे, एके साथ में अइले।

महा ऋषी, बल भरल, परशुराम के इहे कुटिया हउवे, बड़ पवित्र भृगुकुल वंशी, अटल, निश्चली, ब्रहमचारी वीर हउवें।

ह भाई! इ उहे हवन, जे कर्ण जाँध माथा धर सुतल बाड़े; पेड़ के नीचेहिं, कुटिया से तनिका दूरी पर सुतल बाड़े।

मीठा मीठा घाम माध के, लुक-छीप के पत्तवन से आवत रहे; थाकल मुनी के दर्द देह के, घामवा धीमे-धीमे मिटावत रहे ।

भक्ति-भव में लीन कर्ण, बस मोहित हो जाते बाड़न, कंबहुँ जटवन पर हाथ फेर के, कबहुँ पीठ दबावत बाईन ।

गिरत पत्तई ना देही पर पड़े, चीटी ना देही पर चढ़े, सावधान बा कर्ण, गुरू के कचगर नींद ना टुटे ।

झुरकल देह, तप से दुबराइल, तबहुँ हथियार चलावस; हमरे कारण वृद्धा बेरीआ, गुरूवर, आतम भार उठावस।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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