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सर्वनाश सगाई वंश विनाश

सर्वनाश सगाई वंश विनाश

पर्वत की बेटी, कोमल भी, कठोर भी, कोमल क्योंकि सिर्फ बेल पत्र खाकर गुजारी थी,
कठोर भी, क्योंकि कठोर तपस्या जो करती थी,
देवर्षि डिगा न सके, क्योंकि दंभ नहीं भरती थी,
तब वह हिमवान की बेटी थी, पर्वतों में पली थी,
सुरभित थी, उसके साथ जो बँधा, कैलासपति हो गया,
भाँग घोटते रही, फिर भी सब कुछ मिल गया।

आज की कली, हिम खंड़ों पर थिरकी होगी;
बेल पत्र नहीं, बियर खोली होगी, हिमालय के बदले हियूस्टन तक गयी होगी,
जहाँ-जहाँ गया होगा कोई, पीछा नहीं छोड़ी होगी,
घबड़ायी होगी देखकर, राहों में कोई शर्मिष्ठा पड़ी होगी।

ज्योतिष के 35 के पहाड़ों से डरी होगी।
आज की पार्वती से अधिक, भोले को हड़बड़ी होगी ।
तब के भोले के माँ-बाप का पता नहीं,
खुद ही जगत पिता जो ठहरे, इसीलिए कुछ अनहोनी नहीं गुजरी,
बस परीछावन में साँपों के फुफकार से, जो गुजरा, सो गुजरा।

आज का भोला, कुलवंश को उठाकर खुद ऊपर उठ गया; –
देवयानी तुम सपने सजाओ, पर इतना न छम-छमाओ;
नारी-उत्पीड़न से लड़ लेंगे,
पर प्रेम के दामन में दाग न लगाओ। प्रेम मर गया तो क्या नहीं हो जायेगा,
एक शाश्वत सत्य से विश्वास उठ जायेगा।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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